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इमाम रज़ा (अ) के रौज़े की संस्था ने भारत को दान किए 300 ऑक्सीजन जनरेटर

रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरान निर्मित ऑक्सीजन जनरेटर उच्चत अंतरराष्ट्रीय मानकों के हैं, जिन्हें भारत को उपलब्ध करवाया गया है।

नई दिल्ली में ईरान के राजदूत अली चेगनी का कहना हैः गंभीर दमनकारी प्रतिबंधों के बावजूद, सौभाग्य से ईरान उच्च तकनीक चिकित्सा उपकरणों के उत्पादन में एक अच्छे चरण में पहुंच गया है, जिसके कारण आज हम 300 ऑक्सीजन जनरेट मशीनें दोस्त देश भारत को दान कर रहे हैं।

यह सहायता आस्ताने कुद्स रिज़वी द्वारा दान की गई है, जो ईरान के दूतावास के प्रबंधन के तहत भारतीय रेड क्रॉस और अस्पतालों को दी गई है।

भारत को ऑक्सीजन मशीनें दान करने के ईरान के इस क़दम को टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और डिप्लोमैसी इंडिया समेत मीडिया में व्यापक कवरेज दी गई है और सोशल मीडिया में लोगों ने ईरान के इस क़दम का स्वागत किया है।

 

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Sayed Ahmed Shirazi Meets Ayatollah Khaqani in Kuwait

Sayed Ahmed Shirazi Meets Ayatollah Khaqani in Kuwait.

Over the past few days, Sayed Ahmed Shirazi, son of Grand Shia #Jurist Ayatollah Shirazi met with #Ayatollah_Khaqani in #Kuwait. In his meeting with Ayatollah Khaqani, Sayed Ahmed Shirazi delivered the respects and messages of his father, Grand #Ayatollah Sayed Sadiq Shirazi. Other parts of this meeting were focused on the current situation of the Muslim and #Shia world. Furthermore, Sayed Ahmed Shirazi met with some members of the Family of Qalaaf, including Mr.Mohsen Qalaaf and Mr. Mosa Qalaaf, two prominent Shia figures in Kuwait.

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आयरलैंड की संसद में फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में इस्राईल की अवैध कॉलोनियों के निर्माण की निंदा में प्रस्ताव पास हुआ है।

आयरलैंड की संसद में फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में इस्राईल की अवैध कॉलोनियों के निर्माण की निंदा में प्रस्ताव पास हुआ है।

आयरलैंड की सरकार ने देश की संसद में, इस्राईल द्वारा फ़िलिस्तीनी इलाक़ों को ग़ैर क़ानूनी तौर पर हड़पे जाने की निंदा में पास हुए प्रस्ताव का समर्थन किया है। रोयटर्ज़ के मुताबिक़, यह पहली बार है जब यूरोपीय संघ में शामिल किसी सरकार ने इस्राईल की अवैध गतिविधियों के लिए “डी फ़ैक्टो ऐनेकसेशन” शब्दावली इस्तेमाल की है, जिसका अर्थ है, इस्राईल, फ़िलिस्तीन की ज़मीन को जबरन हड़प रहा है।

आयरलैंड के विदेश मंत्री साइमन कोवनी ने इस्राईल की निंदा में पास हुए इस प्रस्ताव का समर्थन किया है और फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ इस्राईल के अन्यायपूर्ण व्यवहार की निंदा की है। इस प्रस्ताव को आयरलैंड के विपक्षी दल शिन फ़ेन ने पेश किया था। कोवनी ने देश की संसद में कहाः कॉलोनियों के विस्तार की इस्राईल की कार्यवाही के स्वरूव और आयाम तथा इस्राईल की नीयत ने हमें यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि जो कुछ ज़मीनी स्तर पर हो रहा है उसके बारे में हमें यथार्थवादी होना चाहिए। यह एक “डी फ़ैक्टो ऐनेकसेशन” है। कोवनी ने कहा कि आयरलैंड पहला देश है जिसने यह क़दम उठाया है और यह इस्राईल के इरादे और उसके असर के बारे में आयरलैंड की गंभीर चिंता को दर्शाता है।

इस बीच आयरलैंड की संसद में, हालिया जंग में फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ ज़ायोनी शासन के अपराधों के मद्देनज़र, आयरलैंड से ज़ायोनी राजदूत को निकालने के बिल पर इसी हफ़्ते मतदान होगा। इस बिल के मसौदे में आया है कि इस्राईली राजदूत, मौजूदा हालात का किसी भी रूप में बचाव नहीं कर सकता। इस बिल के मसौदे में इस्राईल को युद्ध अपराध, जातीय सफ़ाए और अवैध कॉलोनियों के विस्तार का ज़िम्मेदार भी ठहराया गया है।

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लड़कियों के बूलूग़ की उम्र पर अयातुल्ला फ़ैय्याज़ का फ़तवा बदल गया है।

लड़कियों के बूलूग़ की उम्र पर अयातुल्ला फ़ैय्याज़ का फ़तवा बदल गया है। नए फ़तवे के अनुसार, लड़कियों के लिए दायित्व की उम्र 13 चंद्र वर्ष (क़मरी साल) है, बशर्ते कि इस उम्र से पहले बुलूग़ की निशानियों के लक्षण प्रकट न हों।

इसलिए, जिन लड़कियों में अभी तक बुलूग़ की निशानियों के लक्षण नहीं दिखे हैं और 13 वर्ष से कम उम्र की हैं, वे बाध्य(मुकल्लफ़) नहीं हैं। 13 चंद्र वर्ष की आयु तक पहुंचने वाली लड़कियां बाध्य (मुकल्लफ़) हैं, भले ही उनमें बुलूग़ की निशानियों के लक्षण न दिखाई दें।

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What is the niyyah of fasting? How should one make niyyah of fasting?

Question: What is the niyyah of fasting? How should one make niyyah of fasting?

Answer: It is not necessary for a person to pass the niyyah for fasting through his mind or to say that he would be fasting on the following day. In fact, it is sufficient for him to decide that in obedience to the command of Allah he will not perform from the time of Adhan for Fajr prayers up to Maghrib, any act which may invalidate the fast. If a person forgot that it was the month of Ramadhan, and takes notice of this before Zuhr and if he has not performed some act which will invalidates a fast and he makes niyyah, his fast is valid. But if he takes notice of this after Zuhr, he should not perform any act till Maghrib which invalidates a fast and should, as an obligatory precaution, also observe qadha of that fast after Ramadhan.
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Protest against demolition of Jannatul Baqi Cemetery by Saudi regime & demand to rebuild it.

To,

Hon’ble General Secretary

United Nation                                         

Subject: Protest against demolition of Jannatul Baqi Cemetery by Saudi regime & demand to rebuild it.

Dear Hon’bl General Secretary,

I hope this letter finds you well,

Al-Baqi cemetery, the oldest and one of the two most important Islamic graveyards  located in Medina, in current-day Saudi Arabia, was demolished  in 1806 and following reconstruction in the mid-19th century, was destroyed again in 1923.  An alliance of the House of Saud, and the followers of the Wahhabi movement, carried out the demolition.

DAG Foundation has initiated an online petition to the Honourable dignitaries of the United Nations for the immediate re-construction of the Holy Shrines via www.change.org  (Link-http://chng.it/ppvwH476)

Within 72 hours, Hundreds of people, from 25 different countries, including India, USA, UK, Australia, Sweden Tanzania etc have signed this petition. It is worth mentioning that not only people following Islam have signed, but more than 10% who signed are followers of Christianity, Hinduism and other religions. Many other organizations and NGOs in India and abroad had also supported and signed this petition.

 

This petition is basically in support of the oppressed and to save the World Heritage sites of prime importance to Muslims across the World. These cemeteries in Saudi Arabia were having mausoleums of important personalities of Islam and Saudi government demolished them despite worldwide protest.

Jannatul Baqi is considered sacred by a large section of the Muslim community as it is believed that Prophet Mohammad’s daughter along with her four sons & Shia Imams, Hasan ibn Ali(as), Ali ibn Husayn(as), Muhammad al-Baqir(as), and Jafar al-Sadiq(as) were also buried there.  Since the destruction, all over the world, Muslims have been carrying out protest marches and processions urging the ruling Saud Dynasty of Saudi Arabia to allow reconstruction of this holy place but all such requests have never been paid heed to by this extremist dynasty.

Muslims have staged protests across the World every year and have been asking Saudi Government to rebuild them.

We urge UN to safeguard our rights by pressing the Saudi government to reconstruct the holy shrines and repair the graves of sacred personalities of Islam who were laid to rest in Jannat ul Baqi or allow us to donate cash for the reconstruction work. We believe the UN will relay our message to Kingdom of Saudi Arabia.

 

 

Sincerely                                                                      Syed Saif Abbas Naqvi – General Secretary  

 

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Nahjul Balagha – ख़ुत्बा 32 – 45

32- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ज़माने के ज़ुल्म का तज़किरा है और लोगों की पांच क़िस्मों को बयान किया गया है औश्र इसके बाद ज़ोहद की दावत दी गई है)
अय्योहन्नास! हम एक ऐसे ज़माने में पैदा हुए हैं जो सरकष और नाषुक्रा है। यहाँ नेक किरदार बुरा समझा जाता है और ज़ालिम अपने ज़ुल्म में बढ़ता ही जा रहा है। न हम इल्म से कोई फ़ायदा उठाते हैं और न जिन चीज़ों से नावाक़िफ़ हैं उनके बारे में सवाल करते हैं और न किसी मुसीबत का उस वक़्त तक एहसास करते हैं जब तक वह नाज़िल न हो जाए। लोग इस ज़माने में चार तरह के हैं। बाज़ वह हैं जिन्हें रूए ज़मीन पर फ़साद करने से सिर्फ उनके नफ़्स की कमज़ोरी और उनके असलहे की धार की कुन्दी और उनके असबाब की कमी ने रोक रखा है। बाज़ वह हैं जो तलवार खींचते हुए अपने शर का ऐलान कर रहे हैं और अपने सवार प्यादे को जमा कर रहे हैं। अपने नफ़्स को माले दुनिया के हुसूल और लष्कर की क़यादत या मिम्बर की बलन्दी पर उरूज के लिये वक़्फ़ कर दिया है और दीन को बरबाद कर दिया है और यह बदतरीन तिजारत है के तुम दुनिया को अपने नफ़्स की क़ीमत बना दो या अज्र आखि़रत का बदल क़रार दे दो। बाज़ वह हैं जो दुनिया को आखि़रत के आमाल के ज़रिये हासिल करना चाहते हैं और आखि़रत को दुनिया के ज़रिये नहीं हासिल करना चाहते हैं, उन्होंने निगाहों को पहचान लिया है। क़दम नाप-नाप कर रखते हैं। दामन को समेट लिया है और अपने नफ़्स को गोया अमानतदारी के लिये आरास्ता कर लिया है और परवरदिगार की परदेदारी को मासियत का ज़रिया बनाए हुए हैं। बाज़ वह हैं जिन्हें हुसूले इक़्तेदार से नफ़्स की कमज़ोरी और असबाब की नाबूदी ने दूर रखा है और जब हालात ने साज़गारी का सहारा नहीं दिया तो इसी का नाम क़नाअत रख लिया है। यह लोग अहले ज़ोहद का लिबास ज़ेबे तन किये हुए हैं जबके इनकी शाम ज़ाहिदाना है और न सुबह। (पांचवी क़िस्म)- इसके बाद कुछ लोग बाक़ी रह गये हैं जिनकी निगाहों को बाज़गष्त की याद ने झुका दिया है और इनके आंसुओं को ख़ौफ़े महषर ने जारी कर दिया है। इनमें बाज़ आवारा वतन और दौरे इफ़तादा हैं और बाज़ ख़ौफ़ज़दा और गोषानषीन हैं। बाज़ की ज़बानों पर मोहर लगी हुई है और बाज़ इख़लास के साथ महवे दुआ हैं और दर्द रसीदा की तरह रन्जीदा हैं। उन्हें ख़ौफ़े हुक्काम ने गुमनामी की मन्ज़िल तक पहुँचा दिया है।
((( इन्सानी मुआषरे की क्या सच्ची तस्वीर है, जब चाहिये अपने घर, अपने महल्ले, अपने शहर, अपने मुल्क पर एक निगाह डाल लीजिये। इन चारों क़िस्में बयकवक़्त नज़र आ जाएंगी। वह शरीफ़ भी मिल जाएंगे जो सिर्फ़ हालात की तंगी की बिना पर शरीफ़ बने हुए हैं वरना बस चल जाता तो बीवी बच्चों पर भी ज़ुल्म करने से बाज़ नहीं आते। व्ह तीस मार ख़ाँ भी मिल जाएंगे जिनका कुल शरफ़ फ़साद फ़िल अर्ज़ है और किसी को अपनी अहमियत व अज़मत का ज़रिया बनाए हुए हैं के हमने भरी महफ़िल में फ़लाँ को कह दिया और फ़लाँ अख़बार में फ़लाँ के खि़लाफ़ यह मज़मून लिख दिया या अदालत में यह फ़र्ज़ी मुक़दमा दायर कर दिया। वह मुक़द्दस भी मिल जाएंगे जिनका तक़द्दुस ही इनके फ़िस्क़ व फ़जूर का ज़रिया है। दुआ-तावीज़ के नाम पर नामहरमों से खि़लवत इख़्तेयार करते हैं और औलियाअल्लाह से क़रीबतर बनाने के लिये अपने से क़रीबतर बना लेते हैं। चादरें ओढ़ाकर दुआएं मंगवाते हैं और तन्हाई में बुलाकर जादू उतारते हैं। वह फाक़ामस्त भी मिल जाएंगे जिन्हें हालात की मजबूरी ने क़नाअत पर आमादा कर दिया है वरना इनकी सही हालत का अन्दाज़ा दूसरों के दस्तरख़्वानों पर बख़ूबी लगाया जा सकता है। तलाष है इन्सानियत को इस पांचवीं क़िस्म की जो सिवाए पन्जेतने पाक के और किसी के आस्ताने पर नज़र नहीं आती है। काष दुनिया को अब भी होष आ जाए।)))
और बेचारगी ने इन्हें घेर लिया है, गोया वह एक खारे समन्दर के अन्दर ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं जहां मुंह बन्द हैं और दिल ज़ख़्मी है। इन्होंने इस क़द्र मौग़ता किया है के थक गये हैं और वह इस क़द्र दबाए गए हैं के बाला आख़िर दब गये हैं और इस क़द्र मारे गये हैं के इनकी तादाद भी कम हो गयी है। लेहाज़ा अब दुनिया को तुम्हारी निगाहों में कीकर के छिलकों और ऊवन के रेज़ों से भी ज़्यादा पस्त होना चाहिये, और अपने पहलेवालों से इबरत हासिल करनी चाहिये। क़ब्ल इसके के बाद वाले तुम्हारे अन्जाम से इबरत हासिल करें। इस दुनिया को नज़रअन्दाज़ कर दो, यह बहुत ज़लील है यह उनके काम नहीं आई है जो तुमसे ज़्यादा इससे दिल लगाने वाले थे। सय्यद रज़ी- बाज़ जाहिलों ने इस ख़ुत्बे को माविया की तरफ़ मन्सूब कर दिया है जबके बिला शक यह अमीरूल मोमेनीन का कलाम है और भला क्या राबेता है सोने और मिट्टी में और शीरीं और शूर में इस हक़ीक़त की निषानदेही फ़न्ने बलाग़त के माहिर और बा-बसीरत तनक़ीदी नज़र रखने वाले आलिम अमरू बिन बहरल जाख़त ने भी की है जब इस ख़ुत्बे को ‘‘अलबयान व अलतबययन’’ में नक़्ल करने के बाद यह तबसेरा किया है के बाज़ लोगों ने इसे माविया की तरफ़ मन्सूब कर दिया है हालांके यह हज़रत अली (अ0) के अन्दाज़े बयान से ज़्यादा मिलता जुलता है के आप ही इस तरह लोगों के एक़साम, मज़ाहेब और क़हर व ज़िल्लत और तक़या व ख़ौफ़ का तज़केरा किया करते थे वरना माविया को कब अपनी गुफ़्तू में ज़ाहिदों का अन्दाज़ या आबिदों का तरीक़ा इख़्तेयार करते देखा गया है।
33- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(अहले बसरा से जेहाद के लिये निकलते वक़्त, जिसमें आपने रसूलों की बाअसत की हिकमत और फिर अपनी फ़ज़ीलत और ख़वारिज की रज़ीलत का ज़िक्र किया है)
अब्दुल्लाह बिन अब्बास का बयान है के मैं मक़ाम ज़ीक़ार में अमीरूल मोमेनीन (अ0) की खि़दमत में हाज़िर हुआ जब आप अपनी नालैन की मरम्मत कर रहे थे। आपने फ़रमाया इब्ने अब्बास! इन जूतियों की क्या क़ीमत है? मैंने अर्ज़ की कुछ नहीं! फ़रमाया के ख़ुदा की क़सम यह मुझे तुम्हारी हुकूमत से ज़्यादा अज़ीज़ हैं मगर यह के हुकूमत के ज़रिये मैं किसी हक़ को क़ायम कर सकूँ या किसी बातिल को दफ़ा कर सकूँ। इसके बाद लोगों के दरमियान आकर ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया- अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स0) को उस वक़्त मबऊस किया जब अरबों में कोई न आसमानी किताब पढ़ना जानता था और न नबूवत का दावेदार था। आपने लोगों को खींच कर उनके मुक़ाम तक पहुँचाया और उन्हें मन्ज़िले निजात से आषना बना दिया। यहाँ तक के इनकी कजी दुरूस्त हो गई और इनके हालात इसतवार हो गये।
((( अमीरूल मोमेनीन (अ0) के ज़ेरे नज़र ख़ुत्बे की फ़साहत व बलाग़त अपने मक़ाम पर है। आपका यह एक कलमा ही आपकी ज़िन्दगी और आपके नज़रियात का अन्दाज़ा करने के लिये काफ़ी हैं। ख़ुसूसियत के साथ इस सूरतेहाल को निगाह में रखने के बाद के आप जंगे जमल के मौक़े पर बसरा की तरफ़ जा रहे थे और हज़रत आइषा आपके खि़लाफ़ जंग की आग उस प्रोपगन्डा के साथ भड़का रही थीं के आपने हुकूमत व इक़तेदार की लालच में उसमान को क़त्ल करा दिया है और तख़्ते खि़लाफ़त पर क़ाबिज़ हो गए हैं। ज़्ारूरत थी के आप तख़्ते हुकूमत के बारे में अपने नज़रियात का एलान कर देते। लेकिन यह काम ख़ुत्बे की शक्ल में होता तो इसकी अमली शक्ल का समझना हर इन्सान के बस का काम नहीं था लेहाज़ा क़ुदरत ने एक ग़ैबी ज़रिया फ़राहम कर दिया जहाँ आप अपनी जूतियों की मरम्मत कर रहे थे और इब्ने अब्बास सामने आ गए। सूरतेहाल ने पहले तो इस अम्र की वज़ाहत की के आप तख़्ते खि़लाफ़त पर ‘‘क़ाबिज़’’ होने के बाद भी ऐसी ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे के आपके पास सही व सालिम जूतियाँ भी नहीं थीं और फिर षिकस्ता और बोसीदा जूतियों की मरम्मत भी किसी सहाबी या मुलाज़िम से नहीं कराते थे बल्कि यह काम भी ख़ुद ही अन्जाम दिया करते थे। ज़ाहिर है के ऐसे शख़्स को हुकूमत की क्या तमअ हो सकती है और उसे हुकूमत से क्या सुकून व आराम मिल सकता है। इसके बाद आपने दो बुनियाद नुकात का एलान फ़रमाया- 1. मेरी निगाह में हुकूमत की क़ीमत जूतियों के बराबर भी नहीं है के जूतियां तो कम से कम मेरे क़दमों में रहती हैं और तख़्ते हुकूमत तो ज़ालिमों और बेईमानों को भी हासिल हो जाता है। 2. मेरी निगाह में हुकूमत का मसरफ़ सिर्फ़ हक़ का क़याम और बातिल का इज़ाला है वरना इसके बग़ैर हुकूमत का कोई जवाज़ नहीं है।)))
आगाह हो जाओ के ब ख़ुदा क़सम मैं इस सूरते हाल के तबदील करने वालों में शामिल था यहाँतक के हालात मुकम्मल तौर पर तब्दील हो गए और मैं न कमज़ोर हुआ और न ख़ौफ़ज़दा हुआ और आज भी मेरा यह सफ़र वैसे ही मक़ासिद के लिये है। मैं बातिल के षिकम को चाक करके इसके पहलू से वह हक़ निकाल लूंगा जिसे इसने मज़ालिम की तहों में छिपा दिया है। मेरा क़ुरैष से क्या ताल्लुक़ है, मैंने कल इनसे कुफ्र की बिना पर जेहाद किया था और आज फ़ित्ना और गुमराही की बिना पर जेहाद करूंगा। मैं इनका पुराना मद्दे मुक़ाबिल हूँ और आज भी इनके मुक़ाबले पर तैयार हूँ। ख़ुदा की क़सम क़ुरैष को हमसे कोई अदावत नहीं है मगर यह के परवरदिगार ने हमें मुन्तख़ब क़रार दिया है और हमने उनको अपनी जमाअत में दाखि़ल करना चाहा तो वह इन अष्आर के मिस्दाक़ हो गए। हमारी जाँ की क़सम यह शराबे नाबे सबाह यह चर्ब चर्ब ग़िज़ाएं हमारा सदक़ा हैं हमीं ने तुमको यह सारी बलन्दियां दी हैं वगरना तेग़ो सिनां बस हमारा हिस्सा हैं।
(((इस मक़ाम पर यह ख़याल न किया जाए के ऐसे अन्दाज़े गुफ़्तगू से अवामुन्नास में मज़ीद नख़वत पैदा हो जाती है और इनमें काम करने का जज़्बा बिल्कुल मुरदा हो जाता है और अगर वाक़ेअन इमाम अलैहिस्सलाम इसी क़द्र आजिज़ आ गए थे तो फिर बार-बार दुहराने की क्या ज़रूरत थी। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया होता। जो अन्जाम होने वाला था हो जाता और बाला आखि़र लोग अपने कीफ़र किरदार को पहुँच जाते? इसलिये के एक जज़्बाती मष्विरा तो हो सकता है मुन्तक़ी गुफ़्तगू नहीं हो सकती है। उकताहट और नाराज़गी एक फ़ितरी रद्दे अमल है जो अम्रे बिलमारूफ़ की मन्ज़िल में फ़रीज़ा भी बन जाता है। लेकिन इसके बाद भी एतमामे हुज्जत का फ़रीज़ा बहरहाल बाक़ी रह जाता है। फ़िर इमाम (अ0) की निगाहें इस मुस्तक़बिल को भी देख रही थीं जहां मुसलसल हिदायत के पेषेनज़र चन्द अफ़राद ज़रूर पैदा हो जाते हैं और उस वक़्त भी पैदा हो गए थे यह और बात है के क़ज़ा व क़द्र ने साथ नहीं दिया और जेहाद मुकम्मल नहीं हो सका। इसके अलावा यह नुक्ता भी क़ाबिले तवज्जो है के अगर अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने सुकूत इख़्तेयार कर लिया होता तो दुष्मन इसे रज़ामन्दी और बैअत की अलामत बना लेते और मुख़्लेसीन अपनी कोताही अमल का बहाना क़रार दे लेते और इस्लाम की रूह अमल और तहरीक दुनियादारी मुरदा होकर रह जाती।)))
34-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ख़वारिज के क़िस्से के बाद लोगोंं को अहले शाम से जेहाद के लिये आमादा किया गया है और उनके हालात पर अफ़सोस का इज़हार करते हुए इन्हें नसीहत की गई है)
हैफ़ है तुम्हारे हाल पर, मैं तुम्हें मलामत करते करते थक गया। क्या तुम लोग वाक़ेअन आख़ेरत के एवज़ ज़िन्दगानी दुनिया पर राज़ी हो गए हो और तुमने ज़िल्लत को इज़्ज़त का बदल समझ लिया है? के जब मैं तुम्हें दुष्मन से जेहाद की दावत देता हूँ तो तुम आँखें फिराने लगते हो जैसे मौत की बेहोषी तारी हो और ग़फ़लत के नषे में मुब्तिला हो। तुम पर जैसे मेरी गुफ़्तगू के दरवाज़े बन्द हो गए हैं के तुम गुमराह होते जा रहे हो और तुम्हारे दिलों पर दीवानगी का असर हो गया है के तुम्हारी समझ ही में कुछ नहीं आ रहा है। तुम कभी मेरे लिये क़ाबिले एतमाद नहीं हो सकते हो और न ऐसा सुतून हो जिस पर भरोसा किया जासके और न इज़्ज़त के वसाएल हो जिसकी ज़रूरत महसूस की जा सके तुम तो उन ऊंटों जैसे हो जिनके चरवाहे गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाते हैं तो दूसरी तरफ़ से भड़क जाते हैं। ख़ुदा की क़सम! तुम बदतरीन अफ़राद हो जिनके ज़रिये आतिषे जंग को भड़काया जा सके। तुम्हारे साथ मक्र किया जाता है और तुम कोई तद्बीर भी नहीं करते हो। तुम्हारे इलाक़े कम होते जा रहे हैं और तुम्हें ग़ुस्सा भी नहीं आता है। दुष्मन तुम्हारी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं है मगर तुम ग़फ़लत की नींद सो रहे हो। ख़ुदा की क़सम सुस्ती बरतने वाले हमेषा मग़लूब हो जाते हैं और ब-ख़ुदा मैं तुम्हारे बारे में यही ख़याल रखता हूँ के अगर जंग ने ज़ोर पकड़ लिया और मौत का बाज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से यूँही अलग हो जाओगे जिस तरह जिस्म से सर अलग हो जाता है।(((यह दयानतदारी और ईमानदारी की अज़ीमतरीन मिसाल है के कायनात का अमीर मुसलमानों का हाकिम, इस्लाम का ज़िम्मेदार क़ौम के सामने खड़े होकर इस हक़ीक़त का एलान कर रहा है के जिस तरह मेरा हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है इसी तरह तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे भी है। इस्लाम में हाकिम हुक़ूक़ुल इबाद से बलन्दतर नहीं होता है और न उसे क़ानूने इलाही के मुक़ाबले में मुतलक़ुलअनान क़रार दिया जा सकता है। इसके बाद दूसरी एहतियात यह है के पहले अवाम के हुक़ूक़ को अदा करने का ज़िक्र किया। इसके बाद अपने हुक़ूक़ का मुतालबा किया और हुक़ूक़ के बयान में भी अवाम के हुक़ूक़ को अपने हक़ के मुक़ाबले में ज़्यादा अहमियत दी। अपना हक़ सिर्फ़ यह है के क़ौम मुख़लिस रहे और बैयत का हक़ अदा करती रहे और एहकाम की इताअत करती रहे जबके यह किसी हाकिम के इम्तेयाज़ी हुक़ूक़ नहीं हैं बल्के मज़हब के बुनियादी फ़राएज़ हैं। इख़लास व नसीहत हर शख़्स का बुनियादी फ़रीज़ा है। बैअत की पाबन्दी मुआहेदा की पाबन्दी और तक़ाज़ाए इन्सानियत है। एहकाम की इताअत एहकामे इलाहिया की इताअत है और यही ऐन तक़ाज़ाए इस्लाम है। इसके बरखि़लाफ़ अपने ऊपर जिन हुक़ूक़ का ज़िक्र किया गया है वह इस्लाम के बुनियादी फ़राएज़ में शामिल नहीं हैं बल्कि एक हाकिम की ज़िम्मेदारी के शोबे हैं के वह लोगों को तालीम देकर इनकी जेहालत का इलाज करे और उन्हें महज़ब बनाकर अमल की दावत दे और फिर बराबर नसीहत करता रहे और किसी आन भी इनके मसालेह व मनाफ़ेअ से ग़ाफ़िल न होने पाए।)))
ख़ुदा की क़सम अगर कोई शख़्स अपने दुष्मन को इतना क़ाबू दे देता है के वह इसका गोष्त उतार ले और हड्डी तोड़ डाले और खाल के टुकड़े- टुकड़े कर दे तो ऐसा शख़्स आजिज़ी की आखि़री सरहद पर है और इसका वह दिल इन्तेहाई कमज़ोर है जो इसके पहलूओं के दरम्यान है। -2- तुम चाहो तो ऐसे ही हो जाओ लेकिन मैं ख़ुदा गवाह है के इस नौबत के आने से पहले वह तलवार चलाऊंगा के खोपड़ियां टुकड़े- टुकड़े होकर उड़ती दिखाई देंगी और हाथ पैर कट कर गिरते नज़र आएंगे। इसके बाद ख़ुदा जो चाहेगा वह करेगा। अय्योहन्नास एक हक़ तुम्हारे ज़िम्मे है और एक हक़ तुम्हारा मेरे ज़िम्मे है। तुम्हारा हक़ मेरे ज़िम्मे यह है के मैं तुम्हें नसीहत कर दूं और बैतुलमाल का माल तुम्हारे हवाले कर दूँ और तुम्हें तालीम दूँ ताके तुम जाहिल न रह जाओ और अदब सिखाऊं ताके बाअमल हो जाऊँ और मेरा हक़ तुम्हारे ऊपर यह है के बैयत का हक़ अदा करो और हाज़िर व ग़ाएब हर हाल में ख़ैर ख़्वाह रहो। जब पुकारूं तो लब्बैक कहो और जब हुक्म दूँ तो इताअत करो।
35- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब तहकीम के बाद इसके नतीजे की इत्तेला दी गई तो आपने हम्दो सनाए इलाही के बाद इस बलाए का सबब बयान फ़रमाया)
हर हाल में ख़ुदा का शुक्र है चाहिये ज़माना कोई बड़ी मुसीबत क्यों न ले आए और हादेसात कितने ही अज़ीम क्यों न हो जाएं। और मैं गवाही देता हूँ के वह ख़ुदा एक है, इसका कोई शरीक नहीं है और इसके साथ कोई दूसरा माबूद नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) इसके बन्दे और रसूल हैं (ख़ुदा की रहमत इन पर और इनकी आल (अ0) पर)
अम्माबाद! (याद रखो) के नासेह शफ़ीक़ और आलिमे तजुरबेकार की नाफ़रमानी हमेषा बाइसे हसरत और मोजब निदामत हुआ करती है। मैंने तुम्हें तहकीम के बारे में अपनी राय से बाख़बर कर दिया था और अपनी क़ीमती राय का निचोड़ बयान कर दिया था लेकिन ऐ काष ‘‘क़सीर’’ के हुक्म की इताअत की जाती। तुमने तो मेरी इस तरह मुख़ालफ़त की जिस तरह बदतरीन मुख़ालफ़त और अहदे षिकन नाफ़रमान किया करते हैं यहाँ तक के नसीहत करने वाला ख़ुद भी शुबहा में पड़ जाए के किसको नसीहत कर दी और चक़माक़ ने शोले भड़काना बन्द कर दिये। अब हमारा और तुम्हारा वही हाल हुआ है जो बनी हवाज़न के शायर ने कहा थाः ‘‘मैंने तुमको अपनी बात मक़ामे मनारेजुललेवा में बता दी थी, लेकिन तुमने इसकी हक़ीक़त को दूसरे दिन की सुबह ही को पहचाना’’
36- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा   (अहले नहरवान को अन्जामकार से डराने के सिलसिले में)
मैं तुम्हें बाख़बर किये देता हूँ के इस नहर के मोड़ों पर और इस नषेब की हमवार ज़मीनों पर पड़े दिखाई दोगे और तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई वाज़ेअ दलील और रौषन हुज्जत न होगी। तुम्हारे घरों ने तुम्हें निकाल बाहर कर दिया और क़ज़ा व क़द्र ने तुम्हें गिरफ़्तार कर लिया। मैं तुम्हें इस तहकीम से मना कर रहा था लेकिन तुमने अहदषिकन दुष्मनों की तरह मेरी मुख़ालेफ़त की यहाँतक के मैंने अपनी राय को छोड़कर मजबूरन तुम्हारी बात को तस्लीम कर लिया मगर तुम दिमाग़ के हल्के और अक़्ल के अहमक़ निकले। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे। मैंने तो तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डाला है और तुम्हारे लिये कोई नुक़सान नहीं चाहा है।
((( सूरते हाल यह है के जंगे सिफ़फ़ीन के इख़्तेताम के क़रीब जब अम्र व आस के मष्विरे से माविया ने नैज़ों पर क़ुरान बलन्द कर दिये और क़ौम ने जंग रोकने का इरादा कर लिया तो हज़रत ने मुतनब्बेह किया के सिर्फ़ मक्कारी है। इस क़ौम का क़ुरान से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लेकिन क़ौम ने इस हद तक इसरार किया के अगर आप क़ुरान के फ़ैसले को न मानेंगे तो हम आपको क़त्ल कर देंगे या गिरफ़्तार करके माविया के हवाले कर देंगे। ज़ाहिर है के इसके नताएज इन्तेहाई बदतर और संगीन थे लेहाज़ा आपने अपनी राय से क़ता नज़र करके इस बात को तसलीम कर लिया मगर शर्त यही रखी के फ़ैसला किताब व सुन्नत ही के ज़रिये होगा। ममला रफ़ा दफ़ा हो गया लेकिन फ़ैसले के वक़्त माविया के नुमाइन्दे अम्र व आस ने हज़रत अली (अ0) की तरफ़ के नुमाइन्दे अबू मूसा अषअरी को धोका दे दिया और उसने हज़रत अली (अ0) के माज़ूल करने का एलान कर दिया जिसके बाद अम्र व आस ने माविया को नामज़द कर दिया और इसकी हुकूमत मुसल्लम हो गई। हज़रत अली (अ0) के नाम नेहाद असहाब को अपनी हिमाक़त का अन्दाज़ा हुआ और शर्मिन्दगी को मिटाने के लिये उलटा इलज़ाम लगाना शुरू कर दिया के आपने इस तहकीम को क्यों मंज़ूर किया था और ख़ुदा के अलावा किसी को हुक्म क्यों तस्लीम किया था। आप काफ़िर हो गए हैं और आपसे जंग, वाजिब है और यह कहकर मक़ाम हरोरा पर लष्कर जमा करना शुरू कर दिया। उधर हज़रत शाम के मुक़ाबले की तैयारी कर रहे थे लेकिन जब इन ज़ालिमों की शरारत हद से आगे बढ़ गई तो आपने अबू अयूब अन्सारी को फ़हमाइष के लिये भेजा। इनकी तक़रीर का यह असर हुआ के बारा हज़ार में से अक्सरीयत कूफ़े चली गई, या ग़ैर जानिबदार हो गई या हज़रत के साथ आ गई और सिर्फ़ दो तीन हज़ार ख़वारिज रह गए जिनसे मुक़ाबला हुआ तो इस क़यामत का हुआ के सिर्फ़ नौ आदमी बचे। बाक़ी सब फ़िन्नार हो गए और हज़रत के लष्कर से सिर्फ़ आठ अफ़राद शहीद हुए वाक़ेया 9 सफ़र 538 हि0 को पेष आया।)))
37- आपका इरषादे गिरामी
(जो बमन्ज़िलए ख़ुत्बा है और इसमें नहरवान के वाक़ेए के बाद आपने अपने फ़ज़ाएल और कारनामों का तज़किरा किया है।)
मैंने उस वक़्त अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ क़याम किया जब सब नाकाम हो गए थे और उस वक़्त सर उठाया जब सब गोषों में छुपे हुए थे और उस वक़्त बोला जब सब गूंगे हो गए थे और उस वक़्त नूरे ख़ुदा के सहारे आगे बढ़ा जब सब ठहरे हुए थे। मेरी आवाज़ सबसे धीमी थी लेकिन मेरे क़दम सबसे आगे थे। मैंने अनान हुकूमत संभाली तो इसमें क़ूवते परवाज़ पैदा हो गई और मेंै तनो तन्हा इस मैदान में बाज़ी ले गया। मेरा सेबात पहाड़ों जैसा था जिन्हें न तेज़ हवाएं हिला सकती थीं और न आंधियां हटा सकती थीं। न किसी के लिये मेरे किरदार में तान-ओ-तन्ज़ की गुन्जाइष थी और न कोई ऐब लगा सकता था। याद रखो के तुम्हारा ज़लील मेरी निगाह में अज़ीज़ है यहां तक के इसका हक़ दिलवा दूँ और तुम्हारा अज़ीज़ मेरी निगाह में ज़लील है यहाँ तक के इससे हक़ ले लूँ। मैं क़ज़ाए इलाही पर राज़ी हूँ और उसके हुक्म के सामने सरापा तस्लीम हूँ। क्या तुम्हारा ख़्याल है के मैं रसूले अकरम (स0) के बारे में कोई ग़लत बयानी कर सकता हूँ जबके सबसे पहले मैंने आपकी तसदीक़ की है तो अब सबसे पहले झूठ बोलने वाला नहीं हो सकता हूँ। मैंने अपने मुआमले में ग़ौर किया तो मेरे लिये इताअते रसूल (स0) का मरहला बैयत पर मुक़द्दम था और मेरी गरदन में हज़रत के ओहद का तौक़ पहले से पड़ा हुआ था।
38- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें शुबह की वजहे तसमिया बयान की गई है और लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है।) 
यक़ीनन शुबह को शुबह इसीलिये कहा जाता है के वह हक़ से मुषाबेह होता है। इस मौक़े पर औलियाअल्लाह के लिये यक़ीन की रोषनी होती है और सिम्त हिदायत की रहनुमाई। लेकिन दुष्मनाने ख़ुदा की दावत गुमराही और रहनुमा बे बसीरती होती है। याद रखो के मौत से डरने वाला मौत से बच नहीं सकता है और बक़ा का तलबगार बक़ाए दवाम पा नहीं सकता है।
39- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जो माविया के सरदारे लष्कर नामान बिन बषीर के ऐनलतमर पर हमले के वक़्त इरशाद फ़रमाया और लोगों को अपनी नुसरत पर आमादा किया)
मैं ऐसे अफ़राद में मुब्तिला हो गया हूँ जिन्हें हुक्म देता हूँ तो इताअत नहीं करते हैं और बुलाता हूँ तो लब्बैक नहीं कहते हैं। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे, अपने परवरदिगार की मदद करने में किस चीज़ का इन्तेज़ार कर रहे हो। क्या तुम्हें जमा करने वाला दीन नहीं है और क्या जोश दिलाने वाली ग़ैरत नहीं है। मैं तुम में खड़ा होकर आवाज़ देता हूँ और तुम्हें फ़रयाद के लिये बुलाता हूँ लेकिन न मेरी बात सुनते हो और न मेरी इताअत करते हो।
((( माविया की मुफ़सिदाना कारवाइयों में से एक अमल यह भी था के उसने नामान बिन बषीर की सरकरदगी में दो हज़ार का लष्कर ऐनलतमर पर हमला करने के लिये भेज दिया था जबके उस वक़्त अमीरूल मोमेनीन (अ0) की तरफ़ से मालिक बिन कअब एक हज़ार अफ़राद के साथ इलाक़े की निगरानी कर रहे थे लेकिन वह सब मौजूद न थे। मालिक ने हज़रत के पास पैग़ाम भेजा। आपने ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया लेकिन ख़ातिरख़्वाह असर न हुआ। सिर्फ़ अदमी बिन हातम अपने क़बीले के साथ तैयार हुए लेकिन आपने दूसरे क़बाएल को भी शामिल करना चाहा और जैसे ही मख़निफ़ बिन सलीम ने अब्दुर्रहमान बिन मख़निफ के हमराह पचास आदमी रवाना कर दिये लष्करे माविया आती हुई मकक को देख फ़रार कर गया। लेकिन क़ौम के दामन पर नाफ़रमानी का धब्बा रह गया के आम अफ़राद ने हज़रत के कलाम पर कोई तवज्जो नहीं दी।)))
यहाँ तक के हालात के बदतरीन नताएज सामने आ जाएं। सच्ची बात यह है के तुम्हारे ज़रिये न किसी ख़ूने नाहक़ का बदला लिया जा सकता है और न कोई मक़सद हासिल किया जा सकता है। मैंने तुमको तुम्हारे ही भाइयों की मदद के लिये पुकारा मगर तुम उस ऊंट की तरह बिलबिलाने लगे जिसकी नाफ़ में दर्द हो और उस कमज़ोर शतर की तरह सुस्त पड़ गए जिसकी पुष्त ज़ख़्मी हो। इसके बाद तुमसे एक मुख़्तसर सी कमज़ोर, परेषान हाल सिपाह बरामद हुई इस तरह जैसे उन्हें मौत की तरफ़ ढकेला जा रहा हो और यह बेकसी से मौत देख रहे हों। सय्यद रज़ी- हज़रत (अ0) के कलाम में मतज़ाएब मुज़तरिब के मानी में है के अरब इस लफ़्ज़ को उस हवा के बारे में इस्तेमाल करते हैं जिसका रूख़ मुअय्यन नहीं होता है और भेडिये को भी ज़ैब इसीलिसे कहा जाता है के इसकी चाल बे-हंगम होती है।
40- आपका इरषादे गिरामी (ख़वारिज के बारे में इनका यह मक़ौल सुन कर के ‘‘हुक्मे अल्लाह के अलावा किसी के लिये नहीं है) 
यह एक कलमए हक़ है जिससे बातिल मानी मुराद ले गए हैं- बेषक हुक्म सिर्फ़ अल्लाह के लिये है लेकिन उन लोगों का कहना है के हुकूमत और इमारत भी सिर्फ़ अल्लाह के लिये है हालांके खुली हुई बात है के निज़ामे इन्सानियत के लिये एक हाकिम का होना बहरहाल ज़रूरी है चाहे नेक किरदार हो या फ़ासिक़ के हुकूमत के ज़ेरे साया ही मोमिन को काम करने का मौक़ा मिल सकता है और काफ़िर भी मज़े उड़ा सकता है और अल्लाह हर चीज़ को उसकी आखि़री हद तक पहुंचा देता है और माले ग़नीमत व ख़ेराज वग़ैरह जमा किया जाता है और दुष्मनों से जंग की जाती है और रास्तों का तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है और ताक़तवर से कमज़ोर का हक़ लिया जाता है ताके नेक किरदार इन्सान को राहत मिले और बदकिरदार इन्सान से राहत मिले। (एक रिवायत में है के जब आपको तहकीम की इत्तेला मिली तो फ़रमाया) ‘‘मैं तुम्हारे बारे में हुक्मे ख़ुदा का इन्तेज़ार कर रहा हूँ।’’ फिर फ़रमाया – हुकूमत नेक होती है तो मुत्तक़ी को काम करने का मौक़ा मिलता है और हाकिम फ़ासिक़ व फ़ाजिर होता है तो बदबख़्तों को मज़ा उड़ाने का मौक़ा मिलता है यहाँ तक के इसकी मुद्दत तमाम हो जाए और मौत उसे अपनी गिरफ्त में ले ले।
41- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें ग़द्दारी से रोका गया है और इसके नताएज से डराया गया है।)
अय्योहन्नास! याद रखो वफ़ा हमेषा सिदाक़त के साथ रहती है और मैं उससे बेहतर मुहाफ़िज़ कोई सिपर नहीं जानता हूँ और जिसे बाज़गष्त की कैफ़ियत का अन्दाज़ा होता है वह ग़द्दारी नहीं करता है। हम एक ऐसे दौर में वाक़ेअ हुए हैं जिसकी अक्सरीयत ने ग़द्दारी और मक्कारी का नाम होषियारी रख लिया है।
(((सत्रहवीं सदी में एक फ़लसफ़ा ऐसा भी पैदा हुआ था जिसका मक़सद मिज़ाज की हिमायत था और उसका दावा यह था के हुकूमत का वजूद समाज में हामिक व महकूम का इम्तेयाज़ पैदा करता है। हुकूमत से एक तबक़े को अच्छी-अच्छी तन्ख़्वाहें मिल जाती हैं और दूसरा महरूम रह जाता है। एक तबक़े को ताक़त इस्तेमाल करने का हक़ होता है और दूसरे को यह हक़ नहीं होता है और यह सारी बातें मिज़ाजे इन्सानियत के खि़लाफ़ हैँ लेकिन हक़ीक़ते अम्र यह है के यह बयान लफ़्ज़ों में इन्तेहाई हसीन है और हक़ीक़त के एतबार से इन्तेहाई ख़तरनाक है और बयान करदा मफ़ासिद का इलाज यह है के हाकिमे आला को मासूम और आम हुक्काम को अदालत का पाबन्द तस्लीम कर लिया जाए। सारे फ़सादात का ख़ुद-ब-ख़ुद इलाज हो जाएगा।
मज़कूरा बाला फ़लसफ़े के खि़लाफ़ फ़ितरत की रौषनी भी वह थी जिसने 1920 ई0 में इसका जनाज़ा निकाल दिया और फिर कोई ऐसा अहमक़ फ़लसफ़ी नहीं पैदा हुआ।))) और अहले जेहालत ने इसका नाम हुस्ने तदबीर रख लिया है। आखि़र उन्हें क्या हो गया है? ख़ुदा इन्हें ग़ारत करे, वह इन्सान जो हालात के उलट फेर को देख चुका है वह भी हीला के रूख़ को जानता है लेकिन अम्र व नहीं इलाही इसका रास्ता रोक लेते हैं और वह इमकान रखने के बावजूद उस रास्ते को तर्क कर देता है और वह शख़्स इस मौक़े से फ़ायदा उठा लेता है जिसके लिये दीन सरे राह नहीं होता है।
42- आपका इरषादे गिरामी (जिसमें इत्तबाअ ख़्वाहिषात और तूले अमल से डराया गया है)
अय्योहन्नास! मैं तुम्हारे बारे में सबसे ज़्यादा दो चीज़ों का ख़ौफ़ रखता हूँ। इत्तेबाअ ख़्वाहिषात और दराज़िये उम्मीद, के इत्तेबाअ ख़्वाहिषात इन्सान को राहे हक़ से रोक देता है और तूले अमल आख़ेरत को भुला देता है। याद रखो दुनिया मुंह फेरकर जा रही है और इसमें से कुछ बाक़ी नहीं रह गया है मगर उतना जितना बरतन से चीज़ को उण्डेल देने के बाद तह में बाक़ी रह जाता है और आखि़रत अब सामने आ रही है। दुनिया व आख़ेरत दोनों की अपनी औलाद हैं। लेहाज़ा तुम आख़ेरत के फ़रज़न्दों में शामिल हो जाओ और ख़बरदार फ़रज़न्दाने दुनिया में शुमार न होना इसलिये के अनक़रीब हर फ़रज़न्द को इसके माल के साथ मिला दिया जाएगा। आज अमल की मंज़िल है और कोई हिसाब नहीं है और कल हिसाब ही हिसाब है और कोई अमल की गुंजाइष नहीं है।
43- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब जरीर बिन अब्दुल्लाह अल बजली को माविया के पास भेजने और माविया के इन्कारे बैयत के बाद असहाब को अहले शाम से जंग पर आमादा करना चाहा)
इस वक़्त मेरी अहले शाम से जंग की तैयारी जबके जरीर वहां मौजूद हैं शाम पर तमाम दरवाज़े बन्द कर देना है और उन्हें ख़ैर के रास्ते से रोक देना है और अगर वह ख़ैर का इरादा भी करना चाहें मैंने ख़ैर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया है। इसके बाद वह वहाँ या किसी धोके की बिना पर रूक सकते हैं या नाफ़रमानी की बिना पर, और दोनों सूरतों में मेरी राय यही है के इन्तेज़ार किया जाए लेहाज़ा अभी पेषक़दमी न करो और मैं मना भी नहीं करता हूँ अगर अन्दर-अन्दर तैयारी करते रहो। (((इन्सान की आक़ेबत का दारोमदार हक़ाएक और वाक़ेयात पर है और वहां हर शख़्स को इसकी माँ के नाम से पुकारा जाएगा के माँ ही एक साबित हक़ीक़त है बाप की तशख़ीस में तो इख़्तेलाफ़ हो सकता है लेकिन माँ की तशख़ीस में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं हो सकता है। इमाम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह है के दुनिया में आख़ेरत की गोद में परवरिष पाओ ताके क़यामत के दिन इसी से मिला दिये जाओ वरना अबनाए दुनिया इस दिन वह यतीम होंगे जिनका कोई बाप न होगा और माँ को भी पीछे छोड़ कर आए होंगे। ऐसा बेसहारा बनने से बेहतर यह है के यहीं से सहारे का इन्तेज़ाम कर लो और पूरे इन्तेज़ाम के साथ आख़ेरत का सफ़र इख़्तेयार करो।  यह इस अम्र की तरफ़ इषारा है के अमली एहतियात का तक़ाज़ा यह है के दुष्मन को कोई बहाना फ़राहम न करो और वाक़ई एहतियात का तक़ाज़ा यह है के उसके मक्रो फ़रेब से होशियार हो और हर वक़्त मुक़ाबला करने के लिये तैयार रहो।)))
मैंने इस मसले पर मुकम्मल ग़ौरो फ़िक्र कर लिया है और इसके ज़ाहिर व बातिन को उलट पलट कर देख लिया है। अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या जंग करूं या बयानाते पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का इन्कार कर दूँ। मुझसे पहले इस क़ौम का एक हुकमराँ था। उसने इस्लाम में बिदअतें ईजाद कीं और लोगों को बोलने का मौक़ा दिया तो लोगों ने ज़बान खोली। फिर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया और आखि़र में समाज का ढांचा बदल दिया।
44- हज़रत का इरषादे गिरामी
(इस मौक़े पर जब मुस्क़िला बिन हबीरा शीबानी ने आपके आमिल से बनी नाजिया के असीर ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और जब जब हज़रत ने उससे क़ीमत का मुतालबा किया तो बददयानती करते हुए शाम की तरफ़ फ़रार कर गया)
ख़ुदा बुरा करे मुस्क़िला का के उसने काम शरीफ़ों जैसा किया लेकिन फ़रार ग़ुलामों की तरह किया। अभी इसके मद्दाह ने ज़बान खोली भी नहीं थी के इसने ख़ुद ही ख़ामोष कर दिया और इसकी तारीफ़ कुछ कहने वाला कुछ कहने भी न पाया था के इसने मुंह बन्द कर दिया। अगर वह यहीं ठहरा रहता तो मैं जिस क़द्र क़ीमत मुमकिन होता उससे ले लेता और बाक़ी के लिये इसके माल की ज़्यादती का इन्तेज़ार करता।
45- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(यह ईदुल फ़ित्र के मौक़े पर आपके तवील ख़ुत्बे का एक जुज़ है जिसमें हम्दे ख़ुदा और मज़म्मते दुनिया का ज़िक्र किया गया है)
तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी रहमत से मायूस नहीं हुआ जाता और जिसकी नेमत से किसी का दामन ख़ाली नहीं है। न कोई शख़्स इसकी मग़फ़ेरत से मायूस हो सकता है और न किसी में इसकी इबादत से अकड़ने का इमकान है। न इसकी रहमत तमाम होती है और न इसकी नेमत का सिलसिला रूकता है। यह दुनिया एक ऐसा घर है जिसके लिये फ़ना और इसके बाषिन्दों के लिये जिला वतनी मुक़र्रर है। यह देखने में शीरीं और सरसब्ज़ है जो अपने तलबगार की तरफ़ तेज़ी से बढ़ती है और उसके दिल में समा जाती है। लेहाज़ा ख़बरदार इससे कूच की तैयारी करो और बेहतरीन ज़ादे राह लेकर चलो। इस दुनिया में ज़रूरत से ज़्यादा सवाल न करना और जितने से काम चल जाए उससे ज़्यादा का मुतालबा न करना।
((( उस वाक़िये का ख़ुलासा यह है के तहकीम के बाद ख़वारिज ने जिन शोरषों का आगणऩाज़ किया था उनमें एक बनी नाजिया के एक शख़्स ख़रीत बिन राषिद का इक़दाम था जिसको दबाने के लिये हज़रत ने ज़ियादा बिन हफ़सा को रवाना किया था और उन्होंने शोरष को दबा दिया था लेकिन ख़रीत दूसरे इलाक़ों में फ़ितने बरपा करने लगा तो हज़रत ने माक़ल बिन क़ैस रियाही को दो हज़ार का लष्कर देकर रवाना कर दिया और उधर इब्ने अब्बास ने बसरा से मकक भेज दी और बाला आखि़र हज़रत (अ0) के लष्कर ने फ़ितना को दबा दिया और बहुत से अफ़राद को क़ैदी बना लिया। क़ैदियों को लेकर जा रहे थे के रास्ते में मुस्क़ला के शहर से गुज़र हुआ। इसने क़ैदियों की फ़रयाद पर उन्हें ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और क़ीमत की सिर्फ़ एक क़िस्त अदा कर दी। इसके बाद ख़ामोष बैठ गया। हज़रत (अ0) ने बार-बार मुतालबा किया। आखि़र में कूफ़ा आकर दो लाख दिरहम दे दिये और जान बचाने के लिये शाम भाग गया। हज़रत (अ0) ने फ़रमाया के काम शरीफ़ों का किया था लेकिन वाक़ेयन ज़लील ही साबित हुआ। काष इसे इस्लाम के इस क़ानून की इत्तेलाअ होती के क़र्ज़ की अदायगी में जब्र नहीं किया जाता है बल्कि हालात का इन्तेज़ार किया जाता है और जब मक़रूज़ के पास इमकानात फ़राहम हो जाते हैं तब क़र्ज़ का मुतालबा किया जाता है।)))

 

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Nahjul Balagha- ख़ुत्बा 23 – 31 (HINDI)

23- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा  (जिसमें फ़ोक़रा को ज़ोहद और सरमायेदारों को शफ़क़त की हिदायत दी गई है)

अम्मा बाद!- इन्सान के मक़सूम में कम या ज़्यादा जो कुछ भी होता है उसका अम्र आसमान से ज़मीन की तरफ़ बारिष के क़तरात की तरह नाज़िल होता है। लेहाज़ा अगर कोई शख़्स अपने भाई के पास अहल व माल या नफ़्स की फ़रावानी देखे तो इसके लिये फ़ितना न बने।

के मर्दे मुस्लिम के किरदार में अगर ऐसी पस्ती नहीं है जिसके ज़ाहिर हो जाने के बाद जब भी उसका ज़िक्र किया जाए उसकी निगाह शर्म से झुक जाए और पस्त लोगों के हौसले उससे बलन्द हो जाएं तो इसकी मिसाल उस कामयाब जवारी की है जो जुए के तीरों का पाँसा फेंक कर पहले ही मरहले में कामयाबी का इन्तज़ार करता है जिससे फ़ायदा हासिल हो और गुज़िष्ता फसाद की तलाफ़ी हो जाए।

यही हाल उस मर्दे मुसलमान का है जिसका दामन ख़यानत से पाक हो के वह हमेषा परवरदिगार से दो में से एक नेकी का उम्मीदवार रहता है या दाई अजल आजाए तो जो कुछ इसकी बारगाह में है वह इस दुनिया से कहीं ज़्यादा बेहतर है या रिज़क़े ख़ुदा हासिल हो जाए तो वह साहबे अहल व माल भी होगा और इसका दीन और वक़ार भी बरक़रार रहेगा। याद रखो माल और औलाद दुनिया की खेती हैं और अमले स्वालेह आख़ेरत की खेती है और कभी भी परवररिगार बाज़ अक़वाम के लिये दोनों को जमा कर देता है। लेहाज़ा ख़ुदा से इस तरह डरो जिस तरह उसने डरने का हुक्म दिया है और इसका ख़ौफ़ इस तरह पैदा करो के कुछ मारेफ़त न करना पड़े, अमल करो तो दिखाने सुनाने से अलग रखो के जो शख़्स भी ग़ैरे ख़ुदा के वास्ते अमल करता है ख़ुदा उसी शख़्स के हवाले कर देता है। मैं परवरदिगार से शहीदों की मन्ज़िल, नेक बन्दों की सोहबत और अम्बियाए कराम की रिफ़ाक़त की दुआ करता हूं।

अय्योहन्नास! याद रखो के कोई शख़्स किसी क़द्र भी साहबे माल क्यों न हो जाए, अपने क़बीले और उन लोगों के हाथ और ज़बान के ज़रिये दफ़ाअ करने से बेनियाज़ नहीं हो सकता है। यह लोग इन्सान के बेहतरीन मुहाफ़िज़ होते हैं। इसकी परागन्दगी के दूर करने वाले और मुसीबत के नज़ूल के वक़्त इसके हाल पर मेहरबान होते हैं। परवरदिगार बन्दे के लिए जो ज़िक्रे ख़ैर लोगों के दरमियान क़रार देता है वह उस माल से कहीं ज़्यादा बेहतर होता है जिसके वारिस दूसरे अफ़राद हो जाते हैं।

((अगरचे इस्लाम ने बज़ाहिर फ़क़ीर को ग़नी के माल में या रिष्तादार को रिष्तादार के माल में शरीक नहीं बनाया है लेकिन उसका यह फ़ैसला के तमाम अमलाके दुनिया का मालिके हक़ीक़ी परवरदिगार है और इसके एतबार से तमाम बन्दे एक जैसे हैं। सब उसके बन्दे हैं और सबके रिज़्क़  की ज़िम्मादारी इसी की ज़ाते अक़दस पर है। इस अम्र की अलामत है के उसने हर ग़नी के माल में एक हिस्सा फ़क़ीरों और मोहताजों का ज़रूर क़रार दिया है और इसे जबरन वापस नहीं लिया है बल्के ख़ुद ग़नी को इनफ़ाक़ का हुक्म दिया है ताके माल इसके इख़्तेयार से फ़क़ीर तक जाए। इस तरह वह आखि़रत में अज्र व सवाब का हक़दार हो जाएगा और दुनिया में फ़ोक़रा के दिल में इसकी जगह बन जायेगी जो साहेबाने ईमान का शरफ़ है के परवरदिगार लोगों के दिलों में इनकी मोहब्बत क़रार दे देता है। फिर इस इनफ़ाक में किसी तरह का नुक़सान भी नहीं है। माल यूँ ही बाक़ी रह गया तो भी दूसरों ही के काम आएगा तो क्यों न ऐसा हो के उसी के काम आ जाए जिसके ज़ोरे बाज़ू ने जमा किया है और फिर वह जमाअत भी हाथ आ जाए जो किसी वक़्त भी काम आ सकती है। जिगर जिगर होता है और दिगर दिगर होता है।))

आगाह हो जाओ के तुमसे कोई शख़्स भी अपने अक़रबा को मोहताज देखकर इस माल से हाजत बरआरी करने से गुरेज़ न करे जो बाक़ी रह जाए तो बढ़ नहीं जाएगा और ख़र्च कर दिया जाए कम नहीं हो जाएगा। इसलिये जो शख़्स भी अपने अषीरा और क़बीला से अपना हाथ रोक लेता है तो इस क़बीले से एक हाथ रूक जाता है और ख़ुद इसके लिये बेषुमार हाथ रूक जाते हैं। और जिसके मिज़ाज में नरमी होती है वह क़ौम की मोहब्बत को हमेषा के लिये हासिल कर लेता है।

सय्यद रज़ी- इस मक़ाम पर ग़फ़ीरा कसरत के मानी में है जिस तरह जमा कसीर को जमा कषीर कहा जाता है। बाज़ रवायत में ग़फ़ीरा के बजाए इफ़वह है जो मुन्तख़ब और पसन्दीदा शै के मानी है, इस्तेमाल होता है। ‘‘अफ़वतिल तआम’’ पसन्दीदा खाने को कहा जाता है और इमाम अलैहिस्सलाम ने इस मक़ाम पर बेहतरीन नुक्ते की तरफ़ इषारा फ़रमाया है के अगर किसी ने अपना हाथ अषीरा से खींच लिया तो गोया के एक हाथ कम हो गया। लेकिन जब इसे इनकी नुसरत और इमदाद की ज़रूरत होगी और वह हाथ खींच लेंेगे और उसकी आवाज़ पर लब्बैक नहीं कहेंगे तो बहुत से बढ़ने वाले हाथों और उठने वाले क़दमों से महरूम हो जाएगा।

24-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें इताअते ख़ुदा की दावत दी गई है)

मेरी जान की क़सम। मैं हक़ की मुख़ालफ़त करने वालों और गुमराही में बैठने वालों से जेहाद करने में न कोई नरमी कर सकता हूँ और न सुस्ती। अल्लाह के बन्दों! अल्लाह से डरो और उसके ग़ज़ब से फ़रार करके उसकी रहमत में पनाह लो। उस रास्ते पर चलो जो उसने बना दिया है और उन एहकाम पर अमल करो जिन्हें तुम से मरबूत कर दिया गया है। इसके बाद अली (अ) तुम्हारी कामयाबी का आखि़रत में बहरहाल ज़िम्मेदार है चाहे दुनिया में हासिल न हो सके।((अमीरूल मोमेनीन (अ) की खि़लाफ़त का जाएज़ा लिया जाए तो मसाएब व मुष्किलात में सरकारे दो आलम (स) के दौरे रिसालत से कुछ कम नहीं है। आपने तेरा साल मक्के में मुसीबते बरदाष्त कीं और दस साल मदीने में जंगों का मुक़ाबला करते रहे और यही हाल मौलाए कायनात (अ) का रहा। ज़िलहिज्जा 35 हि0 में खि़लाफ़त मिली और माहे मुबारक 40 हि0 में शहीद हो गए। कुल दौरे हुकूमत 4 साल 9 माह 2 दिन रहा और इसमें भी तीन बड़े-बड़े मारके हुए और छोटी-छोटी झड़पें मुसलसल होती रहीं। जहां इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा था और चाहने वालों को अज़ीयत दी जा रही थी। माविया ने अम्र व आस के मष्विरे से बुसर बिन अबी अरताह को तलाष कर लिया था और इस जल्लाद को मुतलक़ुल अनान बनाकर छोड़ दिया था। ज़ाहिर है के ‘‘पागल कुत्ते’’ को आज़ाद छोड़ दिया जाए तो शहरवालों का क्या हाल होगा और इलाक़े के अम्नो अमान में क्या बाक़ी रह जाएगा।))

25- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

जब आपको मुसलसल ख़बर दी गई के मआविया के साथियों ने शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया है और आपके दो आमिले यमन अब्दुल्लाह बिन अब्बास और सईद बिन नमरान, बुसर बिन अबी अरताह के मज़ालिम से परेषान होकर आपकी खि़दमत में आ गए। तो आपने असहाब की कोताही जेहाद से बददिल होकर मिम्बर पर खड़े होकर यह ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया। अब यही कूफ़ा है जिसका बस्त व कषाद मेरे हाथ में है। ऐ कूफ़ा अगर तू ऐसा ही रहा और यूँ ही तेरी आन्धियाँ चलती रहीं तो ख़ुदा तेरा बुरा करेगा। (इसके बाद शाएर के “ोर की तमसील बयान फ़रमाई) ऐ अमरो! तेरे अच्छे बाप की क़सम, मुझे तो उस बरतन की तह में लगी हुई चिकनाई ही मिली है। इसके बाद फ़रमाया, मुझे ख़बर दी गई है के बुसर यमन तक आ गया है और ख़ुदा की क़सम मेरा ख़याल यह है के अनक़रीब यह लोग तुमसे इक़तेदार को छीन लेंगे। इसलिये यह अपने बातिल पर मुत्तहिद हैं और तुम अपने हक़ पर मुत्तहिद नहीं हो। यह अपने पेषवा की बातिल में इताअत करते हैं और तुम अपने इमाम की हक़ में भी नाफ़रमानी करते हो। यह अपने मालिक की अमानत उसके हवाले कर देते हैं और तुम ख़यानत करते हो। यह अपने शहरों में अमन व अमान रखते हैं और तुम अपने शहर में भी फ़साद करते हो।

((ज़रा जाए ख़त की क़ाबलीयत मुलाहेज़ा फ़रमाएं- फ़रमाते हैं के कूफ़े वाले इस लिये नहीं इताअत करते थे के इनकी निगाह तनक़ीदी और बसीरत आमेज़ थी और शाम ववाले अहमक़ और जाहिल थे इसलिये इताअत कर लेते थे। इन क़ाबेलीयत मआब से कौन दरयाफ़्त करे के कूफ़ावालों ने मौलाए कायनात (अ) के किस ऐ़ब की बिना पर इताअत छोड़ दी थी और किस तनक़ीदी नज़र से आप की ज़िन्दगी को देख लिया था। हक़ीक़ते अम्र यह है के कूफ़े व शाम दोनों ज़मीर फ़रोष थे। शाम वालों को ख़रीदार मिल गया था और कूफ़े में हज़रत अली (अ) ने यह तरीक़ाएकार इख़्तेयार कर लिया था के मुँह मांगी क़ीमत नहीं अता की थी लेहाज़ा बग़ावत का होना नागुज़ीर था और यह कोई हैरतअंगेज़ अम्र नहीं है।))

मैं तो तुम में से किसी को लकड़ी के प्याले का भी अमीन बनाऊं तो यह ख़ौफ़ रहेगा के वह कुन्डा लेकर भाग जाएगा। -1- ख़ुदाया मैं इनसे तंग आ गया हूँ और यह मुझसे तंग आ गए हैं। मैं इनसे उकता गया हूँ और यह मुझसे उकता गये हैं। लेहाज़ा मुझे इनसे बेहतर क़ौम इनायत कर दे और इन्हें मुझसे ‘‘बदतर’’ हाकिम दे दे और इनके दिलों को यूँ पिघला दे जिस तरह पानी में नमक भिगोया जाता है। ख़ुदा की क़सम मैं यह पसन्द करता हूँ के इन सब के बदले मुझे बनी फ़रास बिन ग़नम के हरफ़ एक हजार शाही मिल जाएं, जिनके बारे में इनके शाएर ने कहा थाः- ‘‘इस वक़्त में अगर तू इन्हें आवाज़ देगा तो ऐसे शहसवार सामने आएंगे जिनकी तेज़ रफ़्तारी गर्मियों के बादलों से ज़्यादा सरीहतर होगी’’

सय्यद रज़ी – अरमिया रमी की जमा है जिसके मानी बादल हैं और हमीम गर्मी के ज़माने के मानी में हैं, शायर ने गर्मी के बादलों का ज़िक्र इसलिये किया है कि इनकी रफ़तार तेज़ औश्र सुबकतर होती है इसलिये के इनमें पानी नहीं होता है। बादल की रफ़तार उस वक़्त सुस्त हो जाती है जब उसमें पानी भर जाता है और यह आम तौर से सरदी के ज़माने में होता है। शायर ने अपनी क़ौम को आवाज़ पर लब्बैक कहने और मज़लूम की फ़रयाद रसी में सुबक रफ़तारी का ज़िक्र किया है जिसकी दलील ‘‘लौ दऔतो’’ है।

26- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जिसमें बासत से पहले अरब की हालत का ज़िक्र किया गया है और फिर अपनी बैअत से पहले के हालात का तज़किरा किया गया है)

यक़ीनन अल्लाह ने हज़रत मोहम्मद (स) को आलमीन के अज़ाबे इलाही से डराने वाला और तन्ज़ील का अमानतदार बनाकर उस वक़्त भेजा है जब तुम गिरोहे अरब बदतरीन दीन के मालिक और बदतरीन इलाक़े के रहने वाले थे। न हमवार पत्थरों और ज़हरीले सांपों के दरमियान बूदोबाष रखते थे। गन्दा पानी पीते थे और ग़लीज़ ग़िज़ा इस्तेमाल करते थे। आपस में एक दूसरे का ख़ून बहाते थे और क़राबतदारों से बेतआल्लुक़ी रखते थे। बुत तुम्हारे दरम्यान नसब थे और गुनाह तुम्हें घेरे हुए थे।

(बैयत के हंगाम)

मैंने देखा के सिवाए मेरे घरवालों के कोई मेरा मददगार नहीं है तो मैंने उन्हें मौत के मुंह में दे देने से गुरेज़ किया और इस हाल में चष्मपोषी की के आंखों में ख़स्द ख़ाषाक था। मैंने ग़म व ग़ुस्से के घूंट पिये और गुलू गिरफ्तगी और हन्ज़ाल से ज़्यादा तल्क़ हालात पर सब्र किया।

याद रखो! अमर व आस ने माविया की बैयत उस वक़्त तक नहीं की जब तक के बैयत की क़ीमत नहीं तय कर ली। ख़ुदा ने चाहा तो बैयत करने वाले का सौदा कामयाब न होगा और बैयत लेने वाले को भी सिर्फ़ रूसवाई ही नसीब होगी। लेहाज़ा जंग का सामान संभाल लो और इसके असबाब मुहैया कर लो के इसके शोले भड़क उट्ठे हैं और लपटें बलन्द हो चुकी हैं और देखो सब्र को अपना शआर बना लो के यह नुसरत व कामरानी का बेहतरीन ज़रिया है।

((किसी क़ौम के लिये डूब मरने की बात है के उसका मासूम रहनुमा उससे इस क़द्र आजिज़ आ जाए के उसके हक़ में दरपरदा बद्दुआ करने के लिये तैयार हो जाए और उसे दुष्मन के हाथ फ़रोख़्त कर देने पर आमादा हो जाए।

अहले कूफ़ा की बदबख़्ती की आखि़री मन्ज़िल थी के वह अपने मासूम रहनुमा को भी तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम न कर सके और इनके दरम्यान इनका रहनुमा ऐन हालते सजदा में शहीद कर दिया गया। कूफ़े का क़यास मदीने के हालात पर नहीं किया जा सकता है। मदीने ने अपने हाकिम का साथ नहीं दिया इस लिये के वह ख़ुद इसके हरकात से आजिज़ थे और मुसलसल एहतेजाज कर चुके थे लेकिन कूफ़े में ऐसा कुछ नहीं था या वाजे़अ लफ़्ज़ों में यूँ कहा जा सकता है के मदीने के हुक्काम के क़ातिल अपने अमल पर मुतमईन थे और उन्हें किसी तरह की शर्मिन्दगी का एहसास नहीं था लेकिन कूफ़े में जब अमीरूल मोमेनीन (अ) ने अपने क़ातिल से दरयाफ़त किया के क्या मैं तेरा कोई बुरा इमाम था? तो उसने बरजस्ता यही जवाब दिया के आप किसी जहन्नुम में जाने वाले को रोक नहीं सकते हैं। गोया मदीने से कूफ़े तक के हालात से यह बात बिल्कुल वाज़ेअ हो जाती है के मदीने के मक़तूल अपने ज़ुल्म के हाथों क़त्ल हुए थे और कूफ़े का शहीद अपने अद्लो इन्साफ़ की बुनियाद पर शहीद हुआ है और ऐसे ही शहीद को यह कहने का हक़ है के ‘‘फ़ुज़्तो बे रब्बिल काबा’’ (परवरदिगारे काबा की क़सम मैं कामयाब हो गया)))

27-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो उस वक़्त इरषाद फ़रमाया जब आपको ख़बर मिली के माविया के लष्कर ने अनबार पर हमला कर दिया है। इस ख़ुत्बे में जेहाद की फ़ज़ीलत का ज़िक्र करके लोगों को जंग पर आमादा किया गया है और अपनी जंगी महारत का तज़किरा करके नाफ़रमानी की ज़िम्मेदारी लष्करवालों पर डाली गई है)

अम्मा बाद! जेहाद जन्नत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़ा है जिसे परवरदिगार ने अपने मख़सूस औलिया के लिये खोला है। यह तक़वा का लिबास और अल्लाह की महफ़ूज़ व मुस्तहकम ज़िरह और मज़बूत सिपर है। जिसने एराज़ करते हुए नज़रअन्दाज़ कर दिया उसे अल्लाह ज़िल्लत का लिबास पिन्हा देगा और उस पर मुसीबत हावी हो जाएगी और उसे ज़िल्लत व ख़्वारी के साथ ठुकरा दिया जाएगा और उसके दिल पर ग़फ़लत का परदा डाल दिया जाएगा और जेहाद को वाज़ेअ करने की बिना पर हक़ उसके हाथ से निकल जाएगा और उसे ज़िल्लत बरदाष्त करना पड़ेगा और वह इन्साफ़ से महरूम हो जाएगा। (((माविया ने अमीरूलमोमेनीन (अ0) की खि़लाफ़त के खि़लाफ़ बग़ावत का एलान करके पहले सिफ़्फ़ीन का मैदाने कारज़ार गरम किया। उसके बाद हर इलाक़े में फ़ितना व फ़साद की आगणन भड़काई ताके आपको एक लम्हे के लिये सुकून नसीब न हो सके और आप अपने निज़ामे अद्ल व इन्साफ़ को सुकून के साथ राएज न कर सकें। माविया के इन्हीं हरकात में से एक काम यह भी था के बनी ग़ामद के एक शख़्स सुफ़यान बिन औफ़ को छः हज़ार लष्कर देकर रवाना कर दिया के इराक़ के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर ग़ारत का काम शुरू कर दे। चुनान्चे इसने अनबा पर हमला कर दिया जहाँ हज़रत (अ0) का मुख़्तसर सरहदी हिफ़ाज़ती दस्ता था और वह इस लष्कर से मुक़ाबला न कर सका सिर्फ़ चन्द अफ़राद साबित क़दम रहे। बाक़ी सब भाग खड़े हुए और इसके बाद सुफ़ियान का लष्कर आबादी में दाखि़ल हो गया और बेहद लूट मचाई। जिसकी ख़बर ने हज़रत (अ) को बेचैन कर दिया और आपने मिम्बर पर आकर क़ौम को ग़ैरत दिलाई लेकिन कोई लष्कर तैयार न हो सका जिसके बाद आप ख़ुद रवाना हो गए और इस सूरते हाल को देख कर चन्द अफ़राद को ग़ैरत आ गई और एक लष्कर सुफ़ियान के मुक़ाबले के लिये सईद बिन क़ैस की क़यादत में रवाना हो गया मगर इत्तेफ़ाक़ से उस वक़्त सुफ़ियान का लष्कर वापस जा चुका था और लष्कर जंग किये बग़ैर वापस आ गया और आपने नासाज़िए मिज़ाज के बावजूद ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया। बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह ख़ुत्बा कूफ़े वापस आने के बाद इरषाद फ़रमाया है और बाज़ का कहना है के मक़ामे नख़ीला ही पर इरषाद फ़रमाया था बहरहाल सूरत वाक़ेअन इन्तेहाई अफ़सोसनाक और दर्दनाक थी और इस्लाम में इसकी बेषुमार मिसालें पाई जाती हैं))) आगाह हो जाओ के मैंने तुम लोगों को इस क़ौम से जेहाद करने के लिये दिन में पुकारा और रात में आवाज़ दी। ख़ुफ़िया तरीक़े से दावत दी और अलल एलान आमादा किया और बराबर समझाया के इनके हमला करने से पहले तुम मैदान में निकल आओ के ख़ुदा की क़सम जिस क़ौम से उसके घर के अन्दर जंग की जाती है उसका हिस्सा ज़िल्लत के अलावा कुछ नहीं होता है लेकिन तुमने टाल मटोल किया और सुस्ती का मुज़ाहेरा किया। यहां तक के तुम पर मुसलसल हमले शुरू हो गए और तुम्हारे इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। देखो यह बनी ग़ामिद के आदमी (सुफ़यान बिन औफ़) की फ़ौज अनबार में दाखि़ल हो गई है और उसने हेसान बिन हेसान बकरी को क़त्ल कर दिया है और तुम्हारे सिपाहियों को उनके मराकज़ से निकाल बाहर कर दिया है और मुझे तो यहाँ तक ख़बर मिली है के दुष्मन का एक सिपाही मुसलमान या मुसलमानों के मुआहेदे में रहने वाली औरत के पास वारिद होता था। और उसके पैरों के कड़े, हाथ के कंगन, गले के गुलूबन्द और कान के गोषवारे उतार लिया था और वह सिवाए इन्नालिल्लाह पढ़ने और रहमो करम की दरख़्वास्त करने के कुछ नहीं कर सकती थी और वह सारा साज़ोसामान लेकर चला जाता था न कोई ज़ख़्म खाता था और न किसी तरह का ख़ून बहता था। इस सूरतेहाल के बाद अगर कोई मर्दे मुसलमान सदमे से मर भी जाए तो क़ाबिले मलामत नहीं है बल्के मेरे नज़दीक हक़ ब जानिब है। किस क़द्र हैरतअंगेज़ और ताअज्जुबख़ेज़ सूरते हाल है। ख़ुदा की क़सम यह बात दिल को मुर्दा बना देने वाली है व ग़म को समेटने वाली है के यह लोग अपने बातिल पर मुजतमा और मुज्तहिद हैं औश्र तुम अपने हक़ पर भी मुत्तहिद नहीं हो। तुम्हारा बुरा हो, क्या अफ़सोसनाक हाल है तुम्हारा। के तुम तीरअन्दाज़ों का मुस्तक़िल निषाना बन गए हो। तुम पर हमला किया जा रहा है और तुम हमला नहीं करते हो। तुमसे जंग की जा रही है और तुम बाहर नहीं निकलते हो। लोग ख़ुदा की नाफ़रमानी कर रहे हैं और तुम इस सूरतेहाल से ख़ुष हो। मैं तुम्हें गरमी में जेहाद के लिये निकलने की दावत देता हूँ तो कहते हो के शदीद गर्मी है, थोड़ी मोहलत दे दीजिये के गर्मी गुज़र जाए। इसके बाद सर्दी में बुलाता हूँ तो कहते हो सख़्त जाड़ा पड़ रहा है ज़रा ठहर जाइये के सर्दी ख़त्म हो जाए, हालाँके यह सब जंग से फ़रार करने के बहाने हैं वरना जो क़ौम सर्दी और गर्मी से फ़रार करती हो वह तलवारों से किस क़द्र फ़रार करेंगी। ऐ मर्दों की शक्ल व सूरत वालों और वाक़ेअन नामर्दों! तुम्हारी फ़िक्रें बच्चों जैसी और तुम्हारी अक़्लें हुजलानषीन औरतों जैसी हैं। मेरी दिली ख़्वाहिष थी के काष मैं तुम्हें न देखता और तुमसे मुताअर्रूफ़ न होता। जिसका नतीजा सिर्फ़ निदामत और रन्ज व अफ़सोस है। अल्लाह तुम्हें ग़ारत कर दे तुमने मेरे दिल को पीप से भर दिया है और मेरे सीने को रंजो ग़म से छलका दिया है। तुमने हर साँस में हम व ग़म के घूँट पिलाए हैं और अपनी नाफ़रमानी और सरकषी से मेरी राय को भी बेकार व बे असर बना दिया है यहाँ तक के अब क़ुरैष वाले यह कहने लगे हैं के फ़रज़न्दे अबूतालिब बहादुर तो हैं लेकिन इन्हें फ़नूने जंग का इल्म नहीं है। अल्लाह इनका भला करे, क्या इनमें कोई भी ऐसा है जो मुझसे ज़्यादा जंग का तजुर्बा रखता हो और मुझसे पहले से कोई मक़ाम रखता हो, मैंने जेहाद के लिये उस वक़्त क़याम किया है जब मेरी उम्र 20 साल भी नहीं थी और अब तो 60 से ज़्यादा हो चुकी है। लेकिन क्या किया जाए। जिसकी इताअत नहीं की जाती है उसकी राय कोई राय नहीं होती है। (((किसी क़ौम की ज़िल्लत व रूसवाई के लिये इन्तेहाई काफ़ी है के उनका सरबराह हज़रत अली (अ0) बिन अबूतालिब जैसा इन्सान हो और वह उनसे इस क़दर बददिल हो के इनकी शक्लों को देखना भी गवारा न करता हो। ऐसी क़ौम दुनिया में ज़िन्दा रहने के क़ाबिल नहीं है और आखि़रत में भी इसका अन्जाम जहन्नम के अलावा कुछ नहीं है। इस मक़ाम पर मौलाए कायनात (अ0) ने एक और नुक्ते की तरफ़ भी इषारा किया है के तुम्हारी नाफ़रमानी और सरकषी ने मेरी राय को भी बरबाद कर दिया है और हक़ीक़ते अम्र यह है के राहनुमा और सरबराह किसी क़द्र भी ज़की और अबक़री क्यों न हो, अगर क़ौम इसकी इताअत से इन्कार कर दे तो नाफ़हम इन्सान यही ख़याल करता है के शायद यह राय और हुक्म क़ाबिले अहले सनअत न था इसीलिये क़ौम ने इसे नज़रअन्दाज़ कर दिया है। ख़ुसूसियत के साथ अगर काम ही इज्तेमाई हो तो इज्तेमाअ का इन्हेराफ़ काम को भी मुअत्तल कर देता है और इसके नताएज बहरहाल नामुनासिब और ग़लत होते हैं जिसका तजुर्बा मौलाए कायनात (अ0) के सामने आया के क़ौम ने आपके हुक्म के मुताबिक़ जेहाद करने से इनकार कर दिया और गर्मी व सर्दी के बहाने बनाना शुरू कर दे और इसके नतीजे में दुष्मनों ने यह कहना शुरू कर दिया के अली (अ0) फ़नूने जंग से बाख़बर नहीं हैं हालांके अली (अ0) से ज़्यादा इस्लाम में कोई माहिरे जंग व जेहाद नहीं था जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी इस्लामी मुजाहेदात के मैदानों में गुज़ारी थी और मुसलसल तेग़ आज़माई का सबूत दिया था और जिसकी तरफ़ ख़ुद आपने भी इषारा फ़रमाया है और अपनी तारीख़े हयात को इसका गवाह क़रार दिया है। दुष्मनों के तानों से एक बात बहरहाल वाज़ेअ हो जाती है के दुष्मनों को आपकी ज़ाती शुजाअत का इक़रार था और फ़न्ने जंग की नावाक़फ़ीयत से मुराद क़ौम का बेक़ाबू हो जाना था और खुली हुई बात है के अली (अ0) इस तरह क़ौम को क़ाबू में नहीं कर सकते थे जिस तरह माविया जैसे दीन व ज़मीर के ख़रीदार इस कारोबार को अन्जाम दे रहे थे और हर दीन व बेदीनी के ज़रिये क़ौम को अपने क़ाबू में रखना चाहते थे और इनका मन्षा सिफ़ यह था के लष्कर वालों को ऊंट और ऊंटनी का फ़र्क़ मालूम न हो सके।)))

28- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जो उस ख़ुत्बे की एक फ़ज़ीलत की हैसियत रखता है जिसका आग़ाज़ ‘‘अलहम्दो लिल्लाह ग़ैरे मक़नूत मन रहमत’’ से हुआ और इसमें ग्यारह तम्बीहात हैं)

अम्माबाद! यह दुनिया पीठ फेर चुकी है और इसने अपने विदा का एलान कर दिया है और आख़ेरत सामने आ रही है और इसके आसार नुमाया हो गए हैं। याद रखो के आज मैदाने अमल है और कल मुक़ाबला होगा जहाँ सबक़त करने वाले का इनआम जन्नत होगा और बदअमली का अन्जाम जहन्नम होगा। क्या अब भी कोई ऐसा नहीं है जो मौत से पहले ख़ताओं से तौबा कर ले और सख़्ती के दिन से पहले अपने नफ़्स के लिये अमल कर ले। याद रखो के तुम आज उम्मीदों के दिनों में हो जिसके पीछे मौत लगी हुई है तो जिस शख़्स ने उम्मीद के दिनों में मौत आने से पहले अमल कर लिया उसे इसका अमल यक़ीनन फ़ाएदा पहुँचाएगा और मौत कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगी, लेकिन जिसने मौत से पहले उम्मीद के दिनों में अमल नहीं किया उसने अमल की मन्ज़िल में घाटा उठाया और इसकी मौत भी नुक़सानदेह हो गई। आगाह हो जाओ- तुम लोग राहत के हालात में इसी तरह अमल करो जिस तरह ख़ौफ़ के आलम में करते हो, के मैंने जन्नत जैसा कोई मतलूब नहीं देखा है जिसके तलबगार सब सो रहे हैं और जहन्नम जैसा कोई ख़तरा नहीं देखा है जिससे भागने वाले सब ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़े हुए हैं। याद रखो के जिसे हक़ फ़ायदा न पहुँचा सके उसे बातिल ज़रूर नुक़सान पहुंचाएगा और जिसे हिदायत सीधे रास्ते पर न ला सकेगी इसे गुमराही बहरहाल खींच कर हलाकत तक पहुँचा देगी। आगाह हो जाओ के तुम्हें कोच का हुक्म मिल चुका है और तुम्हें ज़ादे सफ़र भी बताया जा चुका है और तुम्हारे लिये सबसे बड़ा ख़ौफ़नाक ख़तरा दो चीज़ों का है। ख़्वाहिषात का इत्तेबाअ और उम्मीदों का तूलानी होना। लेहाज़ा जब तक दुनिया में हुआ इस दुनिया से वह ज़ादे राह हासिल कर लो जिसके ज़रिये कल अपने नफ़्स का तहफ़्फ़ुज़ कर सको। सय्यद रज़ी- अगर कोई ऐसा कलाम हो सकता है जो इन्सान की गर्दन पकड़ कर इसे ज़ोहद की मन्ज़िल तक पहुँचा दे और उसे अमल आखि़रत पर मजबूर कर दे तो वह यही कलाम है। (((ज़माने के हालात का जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के शायद इस दुनिया के इससे बड़ी कोई हक़ीक़त और सिदाक़त नहीं है। जिस शख़्स से पूछिये वह जन्नत का मुष्ताक़ है और जिस शख़्स को देखिये वह जहन्नुम के नाम से पनाह मांगता है। लेकिन मन्ज़िले अमल में दोनों इस तरह सो रहे हैं जैसे के यह माषूक़ अज़ ख़ुद घर आने वाला है और यह ख़तरा अज़ख़ुद टल जाने वाला है। न जन्नत के आषिक़ जन्नत के लिये कोई अमल कर रहे हैं और न जहन्नम से ख़ौफ़ज़दा इससे बचने का इन्तेज़ाम कर रहे हैं बल्कि दोनों का ख़याल यह है के मन्सब में कुछ अफ़राद ऐसे हैं जिन्होंने इस बात का ठेका ले लिया है के वह जन्नत का इन्तेज़ाम भी करेंगे और जहन्नम से बचाने का बन्दोबस्त भी करेंगे और इस सिलसिले में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हालाँके दुनिया के चन्द रोज़ा माषूक़ का मामला इससे बिल्कुल मुख़तलिफ़ है। यहाँ कोई दूसरे पर भरोसा नहीं करता है। दौलत के लिये सब ख़ुद दौड़ते हैं, शोहरत के लिये सब ख़ुद मरते हैं, औरत के लिये सब ख़ुद दीवाने बनते हैं, ओहदे के लिये सब ख़ुद रातों की नीन्द हराम करते हैं, ख़ुदा जाने यह अबदी माषूक़ जन्नत जैसा महबूब है जिसका मामला दूसरों के रहमो करम पर छोड़ दिया जाता है और इन्सान ग़फ़लत की नींद सो जाता है। काष यह इन्सान वाक़ेअन मुष्ताक़ और ख़ौफ़ज़दा होता तो यक़ीनन इसका यह किरदार न होता। ‘‘फ़ाअतबरू या ऊलिल अबसार’’)) यह कलाम दुनिया की उम्मीदों को क़ता करने और वाअज़ व नसीहत क़ुबूल करने के जज़्बात को मुष्तअल करने के लिये काफ़ी होता। ख़ुसूसियत के साथ हज़रत का यह इरषाद के ‘‘आज मैदाने अमल है और कल मुक़ाबला, इसके बाद मन्ज़िले मक़सूद जन्नत है और अन्जाम जहन्नम।’’ इसमें अल्फ़ाज़ की अज़मत मानी की क़द्रो मन्ज़ेलत तहषील की सिदाक़त और तस्बीह की वाक़ेअत के साथ वह अजीबो ग़रीब राज़े निजात और लताफ़त मफ़हूम है जिसका अन्दाज़ा नहीं किया जा सकता है। फिर हज़रत (अ0) ने जन्नत व जहन्नम के बारे में ‘‘सबक़ा‘‘ और ‘‘ग़ायत’’ का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है जिसमें सिर्फ़ लफ़्ज़ी इख़्तेलाफ़ नहीं है बल्के वाक़ेअन मानवी इफ़तेराक़ व इम्तेयाज़ पाया जाता है के न जहन्नम को सबक़ा (मन्ज़िल) कहा जा सकता है और न जन्नत को ग़ायत (अन्जाम) जहाँ तक इन्सान ख़ुद ब ख़ुद पहुंच जाएगा बल्कि जन्नत के लिये दौड़ धूप करना होगी जिसके बाद इनआम मिलने वाला है और जहन्नम बदअमली के नतीजे में ख़ुद ब ख़ुद सामने आ जाएगा। इसके लिये किसी इष्तेयाक़ और मेहनत की ज़रूरत नहीं है। इसी बुनियाद पर आपने जहन्नम को ग़ायत (अन्जाम) क़रार दिया है जिस तरह के क़ुरआन मजीद ने ‘‘मसीर’’ से ताबीर किया है, ‘‘फान मसीर कुम एलन्नार’’। हक़ीक़तनइ स नुक्ते पर ग़ौर करने की ज़रूरत है के इसका बातिन इन्तेहाई अजीब व ग़रीब और इसकी गहराई इन्तेहाई लतीफ़ है और यह तन्हा इस कलाम की बात नहीं है। हज़रत के कलमात में आम तौर से यही बलाग़त पाई जाती है और इसके मआनी में इसी तरह की लताफ़त और गहराई नज़र आती है। बाज़ रिवायात में जन्नत के लिये सबक़त के बजाए सुबक़त का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है जिसके मानी इनआम के हैं और खुली हुई बात है के इनआम भी किसी मज़मूम अमल पर नहीं मिलता है बल्के इसका ताअल्लुक़ भी क़ाबिले तारीफ़ आमाल ही से होता है लेहाज़ा अमल बहरहाल ज़रूरी है और अमल का क़ाबिले तारीफ़ होना भी लाज़मी है।

29- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब तहकीम के बाद माविया के सिपाही ज़हाक बिन क़ैस ने हज्जाज के क़ाफ़िले पर हमला करवा दिया और हज़रत को इसकी ख़बर दी गई तो आप (अ0) ने लोगों को जेहाद पर आमादा करने के लिये यह ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया)

ऐ वह लोग! जिनके जिस्म एक जगह पर हों और ख़्वाहिषात अलग-अलग हों। तुम्हारा कलाम तो सख़्त तरीन पत्थर को भी नर्म कर सकता है लेकिन तुम्हारे बारे में पुरउम्मीद बना देते हैं। तुम महफ़िलों में बैठकर ऐसी-ऐसी बातें करते हो के ख़ुदा की पनाह लेकिन जब जंग का नक़्षा सामने आता है तो कहते हो ‘‘दूर बाष दूर’’ हक़ीक़ते अम्र यह है के जो तुमको पुकारेगा उसकी पुकार कभी कामयाब न होगी और जो तुम्हें बरदाष्त करेगा उसके दिल को कभी सुकून न मिलेगा। तुम्हारे पास सिर्फ बहाने हैं और ग़लत सलत हवाले और फिर मुझसे ताख़ीरे जंग की फ़रमाइष जैसे कोई नादहन्द क़र्ज़ को टालना चाहता है। याद रखो ज़लील आदमी ज़िल्लत को नहीं रोक सकता है और हक़ मेहनत के बग़ैर हासिल नहीं किया हो सकता है। तुम जब अपने घर का दिफ़ाअ न कर सकोगे तो किसके घर का दिफ़ाअ करोगे और जब मेरे साथ्ज्ञ जेहाद न करोगे तो किसके साथ जेहाद करोगे। ख़ुदा की क़सम वह फ़रेब खोरदा है जो तुम्हारे धोके में आ जाए और जो तुम्हारे सहारे कामयाबी चाहेगा इसे सिर्फ नाकामी का तीर हाथ आएगा।

(((माविया का एक मुस्तक़िल मुक़द्दर यह भी था के अमीरूल मोमेनीन (अ0) किसी आन चैन से न बैठने पाएं कहीं ऐसा न हो के आप वाक़ई इस्लाम क़ौम के सामने पेष कर दें और अमवी उफ़कार का जनाज़ा निकल जाए। इसलिये वह मुसलसल रेषा रवानियों में लगा रहता था। आखि़र एक मरतबा ज़हाक बिन क़ैस को चार हज़ार का लष्कर देकर रवाना कर दिया और उसने सारे इलाक़े में कष्त व ख़ून शुरू कर दिया। आपने मिम्बर पर आकर क़ौम को ग़ैरत दिलाई लेकिन कोई खातिर ख़्वाह असर नहीं हुआ और लोग जंग से किनाराकषी करते रहे। यहाँ तक के हजर बिन अदी चार हज़ार सिपाहियों को लेकर निकल पड़े और मुक़ाम तदमर पर दोनों का सामना हो गया। लेकिन माविया का लष्कर भाग खड़ा हुआ और सिर्फ़ 19 अफ़राद माविया के काम आए जबके हजर के सिपाहियों में दो अफ़राद ने जामे शहादत नौष फ़रमाया।)))

और जिसने तुम्हारे ज़रिये तीर फेंका उसने वह तीर फेंका जिसका पैकान टूट चुका है और सूफार ख़त्म हो चुका है। ख़ुदा की क़सम मैं इन हालात में तुम्हारे क़ौल की तस्दीक़ कर सकता हूँ और न तुम्हारी नुसरत की उम्मीद रखता हूँ और न तुम्हारे ज़रिये किसी दुष्मन को तहदीद कर सकता हूँ। आखि़र तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारी दवा क्या है? तुम्हारा इलाज क्या है? आखि़र वह लोग भी तो तुम्हारे ही जैसे इन्सान हैं, यह बग़ैर इल्म की बातें कब तक और यह बग़ैर तक़वा की ग़फ़लते ताबके और बग़ैर हक़ के बलन्दी की ख़्वाहिष कहाँ तक?

30- आपका इरषादे गिरामी (क़त्ले उस्मान की हक़ीक़त के बारे में)

याद रखो अगर मैंने इस क़त्ल का हुक्म दिया होता तो यक़ीनन मैं क़ातिल होता और अगर मैंने मना किया होता तो यक़ीनन मैं मददगार क़रार पाता, लेकिन बहरहाल यह बात तयषुदा है के जिन बनी उमय्या ने मदद की है वह अपने को उनसे बेहतर नहीं कह सकते हैं जिन्होंने नज़रअन्दाज़ कर दिया है आर जिन लोगों ने नज़रअन्दाज़ कर दिया है वह यह नहीं कह सकते के जिसने मदद की है वह हमसे बेहतर था। अब मैं इस क़त्ल का ख़ुलासा बता देता हूँ, ‘‘उस्मान ने खि़लाफ़त को इख़्तेयार किया तो बदतरीन तरीक़े से इख़्तेयार किया और तुम घबरा गए तो बुरी तरह से घबरा गए और अब अल्लाह दोनों के बारे में फ़ैसला करने वाला है।’’

(((यह तारीख़ का मसला है के उसमान ने सारे मुल्क पर बनी उमय्या का इक़्तेदार क़ायम कर दिया था और बैतुलमाल को बेतहाषा अपने ख़ानदान वालों के हवाले कर दिया था जिसकी फ़रयाद पूरे आलमे इस्लाम में शुरू हो गई थी और कूफ़ा और मिस्र तक के लोग फ़रयाद लेकर आ गये थे। अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने दरमियान में बैठकर मसालेहत करवाई और यह तय हो गया के मदीने के हालात की ज़रूरी इस्लाह की जाए और मिस्र का हाकिम मोहम्मद बिन अबीबक्र को बना दिया जाए, लेकिन मुख़ालेफ़ीन के जाने के बाद उस्मान ने हर बात का इन्कार कर दिया और दाई मिस्र के नाम मोहम्मद बिन अबीबक्र के क़त्ल का फ़रमान भेज दिया। ख़त रास्ते में पकड़ लिया गया और जब लोगों ने वापस आकर मदीने वालों को हालात से आगाह किया तो तौबा का इमकान भी ख़त्म हो गया और चारों तरफ़ से मुहासरा हो गया। अब अमीरूल मोमेनीन (अ0) की मुदाख़ेलत के इमकानात भी ख़त्म हो गए थे और बाला आखि़र उस्मान को अपने आमाल और बनी उमय्या की अक़रबा नवाज़ी की सज़ा बरदाष्त करना पड़ी और फिर कोई मरवान या माविया काम नहीं आया।)))

31- आपका इरषादे गिरामी

ज्ब आपने अब्दुल्लाह बिन अब्बास को ज़ुबैर के पास भेजा के इसे जंग से पहले इताअते इमाम (अ0) की तरफ़ वापस ले आएँ।

ख़बरदार तल्हा से मुलाक़ात न करना के इससे मुलाक़ात करोगे तो उसे उस बैल जैसा पाओगे जिसके सींग मुड़े हुए हों। वह सरकष सवारी पर सवार होता है और उसे राम किया हुआ कहते है। तुम सिर्फ़ ज़ुबैर से मुलाक़ात करना इसकी तबीअत क़द्रे नर्म है -4-। उससे कहना के तुम्हारे मामूज़ाद भाई ने फ़रमाया है के तुमने हेजाज़ में मुझे पहचाना था और ईराक़ में आकर बिल्कुल भूल गए हो। आखि़र यह नया सानेहा क्या हो गया है। सय्यद रज़ी- ‘‘माअदा मिम्माबदा’’ यह फ़िक़रा पहले पहल तारीख़े ग़ुरबत में अमीरूल मोमेनीन (अ0) ही से सुना गया है।

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Nahjul Balagha- ख़ुत्बा 5 – 22 (HINDI)

5- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो आपने वफ़ाते पैग़म्बर (स0) के मौक़े पर इरशाद फ़रमाया था जब अब्बास और अबू सुफ़ियान ने आपसे बैअत लेने का मुतालबा किया था)

 अय्योहन्नास! फ़ितनों की मौजों को निजात की कश्तियों से चीर कर निकल जाओ और मनाफ़ेरत के रास्तों से अलग रहो। बाहेमी फ़ख़्र्र व मुबाहात के ताज उतार दो के कामयाबी इसी का हिस्सा है जो उठे तो बालो पर के साथ उठे वरना कुरसी को दूसरों के हवाले करके अपने को आज़ाद कर ले। यह पानी बड़ा गन्दा है और इसका लुक़मे में उच्छू लग जाने का ख़तरा है और याद रखो के नावक़्त (बेवक़्त) फल चुनने वाला ऐसा ही है जैसे नामुनासिब ज़मीन में ज़राअत करने वाला।

(मेरी मुश्किल यह है के) मैं बोलता हूँ तो कहते हैं के इक़्तेदार की लालच रखते हैं और ख़ामोष हो जाता हूँ तो कहते हैं के मौत से डर गए हैं।

((अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने हालात की वह बेहतरीन तस्वीरकषी की है जिसकी तरफ़ अबू सुफ़ियान जैसे अफ़राद मुतवज्जोह नहीं थे या साज़िशों का परदा डालना चाहते थे आपने वाज़ेअ लफ़्ज़ों में फ़रमा दिया के मुझे इस मुतालब-ए- बैअत और वादाए नुसरत का अन्जाम मालूम है और मैं इस वक़्त क़याम को नावक़्त क़याम तसव्वुर करता हूँ जिसका कोई मुसब्बत नतीजा निकलने वाला नहीं है लेहाज़ा बेहतर यह है के इन्सान पहले बालो पर तलाष कर ले उसके बाद उड़ने का इरादा करे वरना ख़ामोष होकर बैठ जाए के इसी में आफ़ियत है और यही तक़ाज़ाए अक़्ल व मन्तक़ है। मैं उस तान व तन्ज़ से भी बाख़बर हूँ जो मेरे एक़दामात के बारे में इस्तेमाल हो रहे हैं लेकिन मैं कोई जज़्बाती इन्सान नहीं हूँ के इन जुमलों से घबरा जाऊँ, मैं मषीयते इलाही का पाबन्द हूँ और उसके खि़लाफ़ एक क़दम आगे नहीं बढ़ा सकता हूँ।))

अफ़सोस अब यह बात जब मैं तमाम मराहेल देख चुका हूँ, ख़ुदा की क़सम अबूतालिब का फ़रज़न्द मौत से उससे ज़्यादा मानूस है जितना बच्चा सरचश्मा-ए-हयात से मानूस होता है। अलबत्ता मेरे सीने की तहों में एक ऐसा पोषीदा इल्म है जो मुझे मजबूर किये हुए है वरना उसे ज़ाहिर कर दूँ तो तुम उसी तरह लरज़ने लगोगे जिस तरह गहने कुँए में रस्सी थरथराती और लरज़ती है।

6- हज़रत का इरशादे गिरामी (जब आपको मशविरा दिया गया के तल्हा व ज़ुबैर का पीछा न करें और उनसे जंग का बन्दोबस्त न करें)

ख़ुदा की क़सम मैं उस बिज्जू के मानिन्द नहीं हो सकता जिसका शिकारी मुसलसल खटखटाता रहता है और वह आँख बन्द किये पड़ा रहता है यहां तक के घात लगाने वाला उसे पकड़ लेता है। मैं हक़ की तरफ़ आने वालों के ज़रिये इन्हेराफ़ करने वालों पर और इताअत करने वालों के सहारे मआसीयतकार तश्कीक करने वालों पर मुसलसल ज़र्ब लगाता रहूँगा यहाँ तक के मेरा आखि़री दिन आ जाए। ख़ुदा गवाह है के मैं हमेशा अपने हक़ से महरूम रखा गया हूँ और दूसरों को मुझ पर मुक़द्दम किया गया है जब से सरकारे दो आलम (स0) का इन्तेक़ाल हुआ है और आज तक यह सिलसिला जारी है।

7- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा  (जिसमें शैतान के पैरोकारों की मज़म्मत की गई है)

उन लोगों ने शैतान को अपने उमूर का मालिक व मुख़्तार बना लिया है औश्र उसने उन्हें अपना आलाएकार क़रार दे लिया है और उन्हीं के सीनों में अण्डे बच्चे दिये हैं और वह उन्हीं की आग़ोश में पले बढ़े हैं। अब शैतान उन्हीं की आंखों से देखता है और उन्हीं की ज़बान से बोलता है उन्हें बग़्िज़श की राह पर लगा दिया है और इनके लिए ग़लत बातों को आरास्ता कर दिया है जैसे के इसने उन्हें अपने कारोबार शरीक बना लिया हो और अपने हरफ़े बातिल को उन्हीं की ज़बान से ज़ाहिर करता हो।

((बिज्जू को अरबी में अमआमिर के नाम से याद किया जाता है इसके शिकार का तरीक़ा यह है के षिकारी इसके गिर्द घेरा डाल कर ज़मीन को थपथपाता है और वह अन्दर सूराख़ में घुस कर बैठ जाता है। फिर शिकारी एलान करता है के अमआमिर नहीं है और वह अपने को सोया हुआ ज़ाहिर करने के लिए पैर फैला देता है और शिकारी पैर में रस्सी बांध कर खींच लेता है। यह इन्तेहाई अहमक़ाना अमल होता है जिस की बिना पर बिज्जू को हिमाक़त की मिसाल बनाकर पेष किया जाता है। आप (अ0) का इरशादे गिरामी है के जेहाद से ग़ाफ़िल होकर ख़ाना नषीन हो जाना और शाम के लश्करों को मदीने का रास्ता बता देना एक बिज्जू का अमल हो सकता है लेकिन अक़्ले कुल और बाबे मदीनतुल इल्म का किरदार नहीं हो सकता है।

शैतानों की तख़लीक़ में अन्डे बच्चे होते हैं या नहीं यह मसला अपनी जगह पर क़ाबिले तहक़ीक़ है लेकिन हज़रत की मुराद है के शयातीन अपने मआनवी बच्चों को इन्सानी मुआशरे से अलग किसी माहौल में नहीं रखते हैं बल्कि उनकी परवरिश इसी माहौल में करते हैं और फिर इन्हीं के ज़रिये अपने मक़ासिद की तकमील करते हैं। ज़माने के हालात का जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के शयातीने ज़माना अपनी औलाद को मुसलमानों की आग़ोश में पालते हैं और मुसलमानों की औलाद को अपनी गोद में पालते हैं ताके मुस्तक़बिल में उन्हें मुकम्मल तौर पर इस्तेमाल किया जा सके और इस्लाम को इस्लाम के ज़रिये फ़ना किया जा सके जिसका सिलसिला कल के शाम से शुरू हुआ था और आज के आलमे इस्लाम तक जारी व सारी है।))

8-आपका इरशादे गिरामी ज़ुबैर के बारे में (जब ऐसे हालात पैदा हो गए और उसे दोबारा बैअत के दायरे में दाखि़ल करने की ज़रूरत पड़ी)

ज़ुबैर का ख़याल यह है के उसने सिर्फ हाथ से मेरी बैअत की है और दिल से बैअत नहीं की है। तो बैअत का तो बहरहाल इक़रार कर लिया है अब सिर्फ दिल के खोट का इदआ करता है तो उसे इसका वाज़ेअ सुबुत फराहम करना पड़ेगा वरना इसी बैअत में दोबारा दाखि़ल होना पड़ेगा जिससे निकल गया है।

9- आपके कलाम का एक हिस्सा (जिसमें अपने और बाज़ मुख़ालेफ़ीन के औसाफ़ का तज़किरा फ़रमाया है और शायद इससे मुराद अहले जमल हैं)

यह लोग बहुत गरजे और बहुत चमके लेकिन आखि़र में नाकाम ही रहे जबके हम उस वक़्त तक गरजते नहीं हैं जब तक दुश्मन पर टूट न पड़ें और उस वक़्त तक लफ़्ज़ों की रवानी नहीं दिखलाते जब तक के बरस न पड़ें।

10- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसका मक़सद शैतान है या शैतान सिफ़त कोई गिरोह)

आगाह हो जाओ के शैतान ने अपने गिरोह को जमा कर लिया है और अपने प्यादे व सवार समेट लिये हैं। लेकिन फिर भी मेरे साथ मेरी बसीरत है। न मैंने किसी को धोका दिया है और न वाके़अन धोका खाया है और ख़ुदा की क़सम मैं इनके लिये ऐसे हौज़ को छलकाऊंगा जिसका पानी निकालने वाला भी मैं ही हूंगा के यह न निकल सकेंगे और न पलट कर आ सकेंगे।

11- आपका इरशादे गिरामी (अपने फ़रज़न्द मोहम्मद बिन अलहनफ़िया से -मैदाने जमल में अलमे लश्कर देते हुए)

ख़बरदार पहाड़ अपनी जगह से हट जाएं, तुम न हटना, अपने दांतों को भींच लेना अपना कासए सर अल्लाह के हवाले कर देना। ज़मीन में क़दम गाड़ देना। निगाह आखि़रे क़ौम पर रखना। आंखों को बन्द रखना और यह याद रखना के मदद अल्लाह ही की तरफ़ से आने वाली है।

((हैरत की बात है के जो इन्सान ऐसे फ़नूने जंग की तालीम देता हो उसे मौत से ख़ौफ़ज़दा होने का इल्ज़ाम दे दिया जाए। अमीरूल मोमेनीन (अ) की मुकम्मल तारीख़े हयात गवाह है के आपसे बड़ा शुजाअ व बहादुर कायनात में नहीं पैदा हुआ है। आप मौत को सरचश्मए हयात तसव्वुर करते थे जिसकी तरफ़ बच्चा फ़ितरी तौर पर हुमकता है और उसे अपनी ज़िन्दगी का राज़ तसव्वुर करता है। आपने सिफ़फीन के मैदान में वह तेग़ के जौहर दिखलाए हैं जिसने एक मरतबा फिर बदर ओहद व ख़न्दक़ व ख़ैबर की याद ताज़ा कर दी थी और यह साबित कर दिया था के यह बाज़ू 25 साल के सुकूत के बाद भी शल नहीं हुए हैं और यह फ़न्ने हरब किसी मश्क़ो महारत का नतीजा नहीं है।  मोहम्मद हनफ़िया से खि़ताब करके यह फ़रमाना के पहाड़ हट जाएं तुम न हटना- इस अम्र की दलील है के आपकी इस्तेक़ामत उससे कहीं ज़्यादा पाएदार और इस्तेवार है। दांतों को भींच लेने में इशारा है के इस तरह रगों के तनाव पर तलवार का वार असर नहीं करता है। कासए सर को आरियत दे देने का मतलब यह है के मालिक ज़िन्दा रखना चाहेगा तो दोबारा यह सर वापस लिया जा सकता है वरना बन्दे ने तो इसकी बारगाह में पेश कर दिया है। आंखों को बन्द रखने और आखि़रे क़ौम पर निगाह रखने का मतलब यह है के सामने के लश्कर को मत देखना, बस यह देखना के कहां तक जाना है और किस तरह सफ़ों को पामाल कर देना है।  आखि़री फ़िक़रा जंग और जेहाद के फ़र्क़ को नुमाया करता है के जंगजू अपनी ताक़त पर भरोसा करता है और मुजाहिद नुसरते इलाही के एतमाद पर मैदान में क़दम जमाता है और जिसकी ख़ुदा मदद कर दे वह कभी मग़लूब नहीं हो सकता है।))

12- आपका इरशादे गिरामी

जब परवरदिगार ने आपको अस्हाबे जमल पर कामयाबी अता फ़रमाई और आपके बाज़ असहाब ने कहा के काश हमारा अफ़लाल भाई भी हमारे साथ होता तो वह देखता के परवरदिगार ने किस तरह आपको दुश्मन पर फ़तह इनायत फ़रमाई है तो आपने फ़रमाया क्या तेरे भाई की मोहब्बत भी हमारे साथ है? उसने अर्ज़ की बेशक। फ़रमाया तो वह हमारे साथ था और हमारे इस लश्कर में वह तमाम लोग हमारे साथ थे जो अभी मर्दों के सुल्ब और औरतों के रह्म में हैं और अनक़रीब ज़माना उन्हें मन्ज़रे आम पर ले आएगा और उनके ज़रिये ईमान को तक़वीयत हासिल होगी। ((यह दीने इस्लाम का एक मख़सूस इम्तियाज़ है के यहां अज़ाब बद अमली के बग़ैर नाज़िल नहीं होता है और सवाब का इस्तेहक़ाक़ अमल के बग़ैर भी हासिल हो जाता है और अमले ख़ैर का दारोमदार सिर्फ़ नीयत पर रखा गया है बल्कि बाज़ औक़ात तो नीयत मोमिन को उसके अमल से भी बेहतर क़रार दिया गया है के अमल में रियाकारी के इमकानात पाए जाते हैं और नीयत में किसी तरह की रियाकारी नहीं होती है और शायद यही वजह है के परवरदिगार ने रोज़े को सिर्फ़ अपने लिए क़रार दिया है और उसके अज्र व सवाब की मख़सूस ज़िम्मेदारी अपने ऊपर रखी है के रोज़े में नीयत के अलावा कुछ नहीं होता है और नीयत में एख़लास के अलावा कुछ नहीं होता है और एख़लास नीयत का फ़ैसला करने वाला परवरदिगार के अलावा कोई नहीं है।))

13- आपका इरशादे गिरामी (जिसमें जंगे जमल के बाद अहले बसरा की मज़म्मत फ़रमाई है)

अफ़सोस तुम लोग एक औरत के सिपाही और एक जानवर के पीछे चलने वाले थे जिसने बिलबिलाना शुरू किया तो तुम लब्बैक -2- कहने लगे और वह ज़ख़्मी हो गया तो तुम भाग खड़े हुए। ((अहले बसरा का बरताव अमीरूल मोमेनीन (अ) के साथ तारीख़ का हर तालिबे इल्म जानता है और जंगे जमल इसका बेहतरीन सबूत है लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ) के बरताव के बारे में तह हुसैन का बयान है के आपने एक करीम इन्सान का बरताव किया और बैतुलमाल का माल दोस्त और दुश्मन दोनों के मुस्तहक़ीन में तक़सीम कर दिया और ज़ख़ीमों पर हमला नहीं किया और हद यह है के क़ैदियों को कनीज़ नहीं बनाया बल्कि निहायत एहतेराम के साथ मदीना वापस कर दिया। – अलीयुन वबनोवा तह हुसैन-))

तुम्हारे इख़लाक़ेयात पस्त तुम्हारा अहद नाक़ाबिले एतबार तुम्हारा दीन निफ़ाक़ और तुम्हारा पानी शूर है। तुम्हारे दरम्यान क़यामक रने वाला गोया गुनाहों के हाथों रेहन है और तुमसे निकल जाने वाला गोया रहमते परवरदिगार को हासिल कर लेने वाला है। मैं तुम्हारी इस मस्जिद को उस आलम में देख रहा हूँ जैसे किश्ती का सीना। जब ख़ुदा तुम्हारी ज़मीन पर ऊपर और नीचे हर तरफ़ से अज़ाब भेजेगा और सारे अहले शहर ग़र्क़ हो जाएंगे।

दूसरी रिवायत में है ख़ुदा की क़सम तुम्हारा शहर ग़र्क़ होने वाला है-3- यहां तक के गोया मैं इसकी मस्जिद को एक किश्ती के सीने की तरह या एक बैठे हुए शुतुरमुर्ग़ की शक्ल में देख रहा हूँ।

तीसरी रिवायत में है जैसे परिन्दा का सीना समन्दर की गहराईयों में।

एक रिवायत में आपका यह इरशाद वारिद हुआ है- तुम्हारा शहर ख़ाक के एतबार से सबसे ज़्यादा बदबूदार है के पानी से सबसे ज़्यादा क़रीब है और आसमान से सबसे ज़्यादा दूर है। इसमें शर के दस हिस्सों में से नौ हिस्से पाए जाते हैंं। इसमें मुक़ीम गुनाहों के हाथों में गिरफ्तार है।

और उससे निकल जाने वाला अज़वे इलाही में दाखि़ल हो गया। गोया मैं तुम्हारी इस बस्ती को देख रहा हूँ के पानी ने इसे इस तरह ढांप लिया है के मस्जिद के कनगरों के अलावा कुछ नज़र नहीं आ रहा है और वह कनगरे भी जिस तरह पानी की गहराई में परिन्दे का सीना।

14- आपका इरशादे गिरामी (ऐसे ही एक मौक़े पर)

तुम्हारी ज़मीन पानी से क़रीबतर और आसमान से दूर है। तुम्हारी अक़्लें हल्की और तुम्हारी दानाई अहमक़ाना है। ((इससे ज़्यादा हिमाक़त क्या हो सकती है के कल जिस ज़बान से क़त्ले उस्मान का फ़तवा सुना था आज उसी से इन्तेक़ामे ख़ूने उस्मान की फ़रियाद सुन रहे हैं और फ़िर भी एतबार कर रहे हैं। इसके बाद एक ऊंट की हिफ़ाज़त पर हज़ारों जानें क़ुरबान कर रहे हैं और सरकारे दोआलम (स) के इस इरशादे गिरामी का एहसास तक नहीं है के मेरी अज़वाज में से किसी एक की सवारी को देख कर हदाब के कुत्ते भौकेंगे और वह आएशा ही हो सकती हैं।)) तुम हर तीरन्दाज़ का निशाना, हर भूके का लुक़्मा और हर शिकारी का शिकार हो। ((तारीख़ का मसलमा है के अमीरूल मोमेनीन (अ) जब बैतुलमाल में दाखि़ल होते थे तो सूई तागा और रोटी के टुकड़े तक तक़सीम कर दिया करते थे और उसके बाद झाड़ू देकर दो रकअत नमाज़ अदा करते थे ताके यह ज़मीन रोज़े क़यामत अली(अ) के अद्ल व इन्साफ़ की गवाही दे और इस बुनियाद पर आपने उस्मान की अताकरदा जागीरों को वापसी का हुक्म दिया और सदक़े के ऊंट उस्मान के घर से वापस मंगवाए के उस्मान किसी क़ीमत पर ज़कात के मुस्तहक़ नहीं थे। अगरचे बाज़ हवाख़्वाहान बनी उमय्या ने यह सवाल उठा दिया है के यह इन्तेहाई बेरहमाना बरताव था जहाँ यतीमों पर रहम नहीं किया गया और उनके क़ब्ज़े से माल ले लिया गया। लेकिन उसका जवाब बिल्कुल वाज़े है के ज़ुल्म और शक़ावत का मुज़ाहिरा उसने किया है जिसने ग़ुरबा व मसाकीन का हक़ अपने घर में जमा कर लिया है और माले मुस्लेमीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। फिर यह कोइ नया हादसा भी नहीं है। कल पहली खि़लाफ़त में यतीमाए रसूले अकरम (स) पर कब रहम किया गया था जो वाक़ेअन फ़िदक की हक़दार थीं और उसके बाबा ने उसे यह जागीर हुक्मे ख़ुदा से अता कर दी थी। औलादे उस्मान तो हक़दार भी नहीं हैं और क्या औलादे उस्मान का मरतबा औलादे रसूल (स) से बलन्दतर है या हर दौर के लिये एक नयी शरीअत मुरत्तब की जाती है और इसका महवर सरकारी मसालेह और जमाअती फ़वाएद ही होते हैं।))

15- आपके कलाम का एक हिस्सा (इस मौज़ू से मुताल्लिक़ के आपने उस्मान की जागीरों को मुसलमानों को वापस दे दिया)

ख़ुदा की क़सम अगर मैं किसी माल को इस हालत में पाता के उसे औरत का मेहर बना दिया गया है या कनीज़ों की क़ीमत के तौर पर दे दिया गया है तो भी उसे वापस कर देता इसलिये के इन्साफ़ में बड़ी वुसअत पाई जाती है और जिसके लिये इन्साफ़ में तंगी हो उसके लिये ज़ुल्म में तो और भी तंगी होगी।

16- आपके कलाम का एक हिस्सा

(उस वक़्त जब आपकी मदीना में बैअत की गई और आपने लोगों को बैअत के मुस्तक़बिल से आगाह करते हुए उनकी क़िस्में बयान फ़रमाईं)

मैं अपने क़ौल का ख़ुद ज़िम्मेदार और उसकी सेहत का ज़ामिन हूँ और जिस श़ख़्स पर गुज़िश्ता अक़वाम की सज़ाओं ने इबरतों को वाज़ेअ कर दिया हो उसे तक़वा शुबहात में दाखि़ल होने से यक़ीनन रोक देगा। आगाह हो जाओ आज तुम्हारे लिये वह आज़माइशी दौर पलट आया है जो उस वक़्त था जब परवरदिगार ने अपनु रसूल (स) को भेजा था। क़सम है उस परवरदिगार की जिसने आप (अ) को हक़ के साथ मबऊस किया था के तुम सख़्ती के साथ तहो बाला किये जाओगे।   तुम्हें बाक़ाएदा छाना जाएगा और देग की तरह चमचे से उलट-पलट किया जाएगा यहाँ तक के असफ़ल आला हो जाए और आला असफ़ल बन जाए और जो पीछे रह गए हैं वह आगे बढ़ जाएं और जो आगे बढ़ गए हैं वह पीछे आ जाएं। ख़ुदा गवाह है के मैंने न किसी कलमे को छिपाया है और न कोई ग़लत बयानी की है और मुझे उस मन्ज़िल और उस दिन की पहले ही ख़बर दे दी गई थी।

याद रखो के ख़ताएं वह सरकश सवारियां हैं जिन पर अहले ख़ता को सवार कर दिया जाए और उनकी लगाम को ढीला छोड़ दिया जाए और वह सवार को ले कर जहन्नुम में फान्द पड़ें और तक़वा उन रअम की हुई सवारियों के मानिन्द है जिन पर लोग सवार किये जाएं और उनकी लगाम इनके हाथों में दे दी जाए तो वह अपने सवारों को जन्नत तक पहुँचा दें।

दुनिया में हक़ व बातिल दोनों हैं और दोनों के अहल भी हैं। अब अगर बातिल ज़्यादा हो गया है तो यह हमेशा से होता चला आया है और अगर हक़ कम हो गया है तो यह भी होता रहा है और उसके खि़लाफ़ भी हो सकता है। अगरचे ऐसा कम ही होता है के कोई शै पीछे हट जाने के बाद दोबारा मन्ज़रे आम पर आजाए। ((मालिके कायनात ने इन्सान को बेपनाह सलाहियतों का मालिक बनाया है और इसकी फ़ितरत में ख़ैर व शर का सारा इरफ़ान वदलीत कर दिया है लेकिन इन्सान की बदक़िस्मती यह है के वह उन सलाहियतों से फ़ाएदा नहीं उठाता है और हमेशा अपने को बेचारा ही समझता है जो जेहालत की बदतरीन मन्ज़िल है के इन्सान को अपनी ही क़द्र व क़ीमत का अन्दाज़ा न हो सके। किसी शाएर ने क्या ख़ूब कहा हैः  अपनी ही ज़ात का इन्सान को इरफ़ाँ न हुआ;     ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी ))

सय्यद रज़ी- इस मुख़्तसर से कलाम में इस क़दर ख़ूबियां पाई जाती हैं जहां तक किसी की दाद व तारीफ़ नहीं पहुँच सकती है और इसमें हैरत व इस्तेजाब का हिस्सा पसन्दीरगी की मिक़दार से कहीं ज़्यादा है। इसमें फ़साहत के वह पहलू भी हैं जिनको कोई ज़बान बयान नहीं कर सकती है और उनकी गहराईयों का कोई इन्सान इदराक नहीं कर सकता है और इस हक़ीक़त को वही इन्सान समझ सकता है जिसने फन्ने बलाग़त का हक़ अदा किया हो और उसके रगो रेशे से बाख़बर हो। और उन हक़ाएक़ को अहले इल्म के अलावा कोई नहीं समझ सकता है।

इसी ख़ुत्बे का एक हिस्सा जिसमें लोगों को तीन हिस्सों पर तक़सीम किया गया है-

वह शख़्स किसी तरफ़ देखने की फ़ुरसत नहीं रखता जिसकी निगाह में जन्नत व जहन्नम का नक़्शा हो। तेज़ रफ़तारी से काम करने वाला निजात पा लेता है और सुस्त रफ़तारी से काम करके जन्नत की तलबगारी करने वाला भी उम्मीदवार रहता है लेकिन कोताही करने वाला जहन्नम में गिर पड़ता है। दाहिने बाएं गुमराहियों की मंज़िलें हैं और सीधा रास्ता सिर्फ़ दरमियानी रास्ता है इसी रास्ते पर रह जाने वाली किताबे ख़ुदा और नबूवत के आसार हैं और इसी से शरीअत का नेफ़ाज़ होता है और इसी की तरफ़ आक़ेबत की बाज़गश्त है। ग़लत अद्आ करने वाला हलाक हुआ और इफ़तरा करने वाला नाकाम व नामुराद हुआ। जिसने हक़ के मुक़ाबले में सर निकाला वह हलाक हो गया और इन्सान की जेहालत के लिये इतना ही काफ़ी है के इसे अपनी ज़ात का भी इरफ़ान न हो। जो बुनियाद तक़वा पर क़ाएम होती है उसमें हलाकत नहीं होती है और इसके होते हुए किसी क़ौम की खेती प्यास से बरबाद नहीं होती है। अब तुम अपने घरों में छिप कर बैठ जाओ और अपने बाहेमी उमूर की इस्लाह करो। तौबा तुम्हारे सामने है -3-। तारीफ़ करने वाले का फर्ज़ है के अपने रब की तारीफ़ करे और मलामत करने वाले को चाहिए के अपने नफ़स की मलामत करे।

17- आपका इरशादे गिरामी

(उन ना-अहलों के बारे में जो सलाहियत के बग़ैर फै़सले का काम शुरू कर देते हैं और इसी ज़ैल में दो बदतरीन इक़साम मख़लूक़ात का ज़िक्र भी है)

क़िस्मे अव्वल- याद रखो के परवरदिगार की निगाह में बदतरीन ख़लाएक़ दो तरह के अफ़राद हैं (( जाहिल इन्सानों की हमेषा यह ख़्वाहिश होती है के परवरदिगार उन्हें उनके हाल पर छोड़ दे और वह जो चाहें करें किसी तरह की कोई पाबन्दी न हो हालांकि दरहक़ीक़त यह बदतरीन अज़ाबे इलाही है। इन्सान की फ़लाहो बहबूद इसी में है के मालिक उसे अपने रहम व करम के साये में रखे वरना अगर उससे तौफ़ीक़ात को सल्ब करके उसके हाल पर छोड़ दिया तो वह लम्हों में फ़िरऔन, क़ारून, नमरूद, हज्जाज और मुतवक्किल बन सकता है। अगरचे उसे एहसास यही रहेगा के उसने कायनात का इक़तेदार हासिल कर लिया है और परवरदिगार उसके हाल पर बहुत ज़्यादा मेहरबान है।))

 वह शख़्स जिसे परवरदिगार ने इसी के रहम व करम पर छोड़ दिया है और वह दरमियानी रास्ते से हट गया है। सिर्फ़ बिदअत का विल्दावा है और गुमराही की दावत पर फ़रेफ़ता है। यह दूसरे अफ़राद के लिये एक मुस्तक़िल फ़ितना है और साबिक़ अफ़राद की हिदायत से बहका हुआ है। अपने पैरोकारों को गुमराह करने वाला है ज़िन्दगी में भी और मरने के बाद भी। यह दूसरों की ग़ल्तियों का भी बोझ उठाने वाला है और उनकी ख़ताओं में भी गिरफ़तार है।

क़िस्मे दोम- वह शख़्स जिसने जेहालतों को समेट लिया है और उन्हीं के सहारे जाहिलों के दरम्यान दौड़ लगा रहा है ((क़ाज़ियों की यह क़िस्म हर दौर में रही है और हर इलाक़े में पाई जाती है। बाज़ लोग गांव या शहर में इसी बात को अपना इम्तेयाज़ तसव्वुर करते हैं के उन्हें फ़ैसला करने का हक़ हासिल है अगरचे उनमें किसी क़िस्म की सलाहियत नहीं है। यही वह क़िस्म है जिसने दीने ख़ुदा को तबाह और ख़ल्क़े ख़ुदा को गुमराह किया है और यही क़िस्म शरीह से शुरू होकर उन अफ़राद तक पहुंच गई है जो दूसरों के मसाएल को बाआसानी तय कर देते हैं और अपने मसले में किसी तरह के फ़ैसले से राज़ी नहीं होते हैं और न किसी की राय को सुनने के लिये तैयार होते हैं)) फ़ित्नों की तारीकियों में दौड़ रहा है और अम्न व सुलह के फ़वाएद से यकसर ग़ाफ़िल है। इन्साननुमा लोगों ने इसका नाम आलिम रख दिया है हालाँके इसका इल्म से कोई ताल्लुक़ नहीं है। सुबह सवेरे इन बातों की तलाश में निकल पड़ता है जिनका क़लील इनके कसीर से बेहतर है। यहां तक के जब गन्दे पानी से सेराब हो जाता है और महमिल और बेफ़ाएदा बातों को जमा कर लेता है तो लोगों के दरमियान क़ाज़ी बन कर बैठ जाता है और इस अम्र की ज़िम्मेदारी ले लेता है के जो उमूर दूसरे लोगों पर मुश्तबह हैं वह उन्हें साफ़ कर देगा। इसके बाद जब कोई मुबहम मसला आ जाता है तो इसके लिए बे सूद और फ़रसूदा दलाएल को इकट्ठा करता है और उन्हीं से फ़ैसला कर देता है। यह शबाहत में इसी तरह गिरफ़तार है जिस तरह मकड़ी अपने जाले में फंस जाती है। इसे यह भी नहीं मालूम है के सही फ़ैसला किया है या ग़लत। अगर सही किया है तो भी डरता है के शायद ग़लत हो और अगर ग़लत किया है तो भी यह उम्मीद रखता है के शायद सही हो। ऐसा जाहिल है जो जिहालतों में भटक रहा हो और ऐसा अन्धा है जो अन्धेरों की सवारी पर सवार हो। न इल्म में कोई हतमी बात समझा है और न किसी हक़ीक़त को परखा है। रिवायात को यूं उड़ा देता है जिस तरह तेज़ हवा तिनकों को उड़ा देती है। ख़ुदा गवाह है के यह इन फ़ैसलों के सादिर करने के क़ाबिल नहीं है जो उसपर वारिद होते हैं और इस काम का अहल नहीं है जो उसके हवाले किया गया है। जिस चीज़ को नाक़ाबिले तवज्जो समझता है उसमें इल्म का एहतेसाल भी नहीं देता है और अपनी पहुंच के मावराए किसी और राय का तसव्वुर भी नहीं करता है। अगर कोई मसला वाज़े नहीं होता है तो उसे छिपा देता है के उसे अपनी जिहालत का इल्म है।

नाहक़ बहाए हुए ख़ून इसके फै़सलों के ज़ुल्म से फ़रयादी हैं और ग़लत तक़सीम की हुई मीरास चिल्ला रही है। मैं ख़ुदा की बारगाह में फ़रयाद करता हूं ऐसे गिरोह जो ज़िन्दा रहते हैं तो जेहालत के साथ और मर जाते हैं तो ज़लालत के साथ। इनके नज़दीक कोई मताअ किताबे ख़ुदा से ज़्यादा बेक़ीमत नहीं है अगर इसकी वाक़ई तिलावत की जाए और कोई मताअ इस किताब से ज़्यादा क़ीमती और फ़ाएदामन्द नहीं है अगर उसके मफ़ाहिम में तहरीफ़ कर दी जाए। इनके लिए मारूफ़ से ज़्यादा मुन्किर कुछ नहीं है और मुन्किर से ज़्यादा मारूफ़ कुछ नहीं है। ((याद रहे के अमीरूल मोमेनीन (अ) ने मसले के तमाम एहतेमालात का सद बाब कर दिया है और अब किसी राय परस्त इन्सान के लिए फ़रार करने का कोई रास्ता नहीं है और उसे नमसब में राय और क़यास इस्तेमाल करने के लिये एक न एक महमिल बुनयाद को इख़्तेयार करना पड़ेगा। इसके बग़ैर राय और क़यास का कोई जवाज़ नहीं है।))

18- आपका इरशादे गिरामी

(उलमा के दरमियान इख़तेलाफ़े फ़तवा के बारे में और इसी में अहल राय की मज़म्मत और क़ुरआन की मरजईयत का ज़िक्र किया गया है)

मज़म्मत अहल राय- उन लोगों का आलम यह है के एक शख़्स के पस किसी मसले का फ़ैसला आता है तो वह अपनी राय से फ़ैसला कर देता है और फ़िर यही क़ज़िया बअय्यना दूसरे के पास जाता है तो वह उसके खि़लाफ़ फ़ैसला कर देता है। इसके बाद तमाम क़ज़ात इस हाकिम के पास जमा होते हैं जिसने इन्हें क़ाज़ी बनाया है तो वह सबकी राय से ताईद कर देता है जबके सबका ख़ुदा एक, नबी एक और किताब एक है तो क्या ख़ुदा ही ने इन्हें इख़्तेलाफ़ का हुक्म दिया है और यह इसी की इताअत कर रहे हैं या उसने उन्हें इख़्तेलाफ़ से मना किया है मगर फ़िर भी इसकी मुख़ालेफ़त कर रहे हैं? या ख़ुदा ने दीने नाक़िस नाज़िल किया है और उनसे इसकी तकमील के लिये मदद मांगी है या यह सब ख़ुद इसकी ख़ुदाई ही में शरीक हैं और इन्हें यह हक़ हासिल है के यह बात कहें और ख़ुदा का फ़र्ज़ है के वह क़ुबूल करे या ख़ुदा ने दीने कामिल नाज़िल किया था और रसूले अकरम (स) ने इसकी तबलीग़ और अदायगी में कोताही कर दी है, जबके इसका एलान है के हमने किताब में किसी तरह की कोताही नहीं की है और इसमें हर शै का बयान मौजूद है -2-। और यह भी बता दिया है के इसका एक हिस्सा दूसरे की तस्दीक़ करता है और इसमें किसी तरह का इख़्तेलाफ़ नहीं है। यह क़ुरआन ग़ैर ख़ुदा की तरफ़ से होता तो इसमें बेपनाह इख़्तेलाफ़ात होता। यह क़ुरआन वह है जिसका ज़ाहिर ख़ूबसूरत और बातिन अमीक़ और गहराए। इसके अजाएब फ़ना होने वाले नहीं हैं और तारीकियों का ख़ात्मा इसके अलावा और किसी कलाम से नहीं हो सकता है।

19- आपका इरशादे गिरामी

(जिसे उस वक़्त फ़रमाया जब मिम्बरे कूफ़े पर ख़ुत्बा दे रहे थे और अशअस बिन क़ैस ने टोक दिया के यह बयान आप ख़ुद अपने खि़लाफ़ दे रहे हैं। आपने पहले निगाहों को नीचा करके सुकूत फ़रमाया और फिर पुरजलाल अन्दाज़ से फ़रमाया)

तुझे क्या ख़बर के कौन सी बात मेरे मवाफ़िक़ है और कौन सी मेरे खि़लाफ़ है। तुझ पर ख़ुदा और तमाम लाअनत करने वालों की लानत, तू सुख़न बाफ़ और ताने बाने दुरूस्त करने वाले का फ़रज़न्द है। तू मुनाफ़िक़ है और तेरा बाप खुला हुआ काफ़िर था। ख़ुदा की क़सम तू एक मरतबा कुफ्ऱ का क़ैदी बना और दूसरी मरतबा इस्लाम का। लेकिन न तेरा माल काम आया न हसब। और जो शख़्स भी अपनी क़ौम की तरफ़ तलवार को रास्ता बताएगा और मौत को खींच कर लाएगा वह इस बात का हक़दार है के क़रीब वाले उससे नफ़रत करें और दूर वाले इस पर भरोसा न करें।

सय्यद रज़ी – – इमाम (अ) का मक़सद यह है के अशअत बिन क़ैस एक मरतबा दौरे कुफ्ऱ में क़ैदी बना था और दूसरी मरतबा इस्लाम लाने के बाद। तलवार की रहनुमाई का मक़सद यह है के जब यमामा में ख़ालिद बिन वलीद ने चढ़ाई की तो उसने अपनी क़ौम से ग़द्दारी की और सबको ख़ालिद की तलवार के हवाले कर दिया जिसके बाद इसका लक़ब ‘‘उरफ़ुल नार’’ हो गया जो उस दौर में हर ग़द्दार का लक़ब हुआ करता था।

20- आपका इरशादे गिरामी

(जिसमें ग़फ़लत से बेदार किया गया है और ख़ुदा की तरफ़ दौड़कर आने की दावत दी गई है।)

यक़ीनन जिन हालात को तुमसे पहले मरने वालों ने देख लिया है अगर तुम भी देख लेते तो परेशान व मुज़तरिब हो जाते और बात सुनने और इताअत करने के लिये तैयार हो जाते लेकिन मुश्किल यह है के अभी वह चीज़ तुम्हारे लिये पस हिजाब हैं और अनक़रीब यह परदा उठने वाला है। बेशक तुम्हें सब कुछ दिखाया जा चुका है अगर तुम निगाह बीना रखते हो और सब कुछ सुनाया जा चुका है अगर तुम गोश शनवार रखते हो और तुम्हें हिदायत दी जा चुकी है अगर तुम हिदायत हासिल करना चाहो और मैं बिल्कुल बरहक़ कह रहा हूँ के अनक़रीब तुम्हारे सामने खुल कर आ चुकी हैं और तुम्हें इस क़दर डराया जा चुका है जो बक़द्र काफ़ी है और ज़ाहिर है के आसमानी फ़रिश्तों के बाद इलाही पैग़ाम को इन्सान ही पहुंचाने वाला है।

21- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो एक कलमा है लेकिन तमाम मोअज़त व हिकमत को अपने अन्दर समेटे हुए है)

बेशक मन्ज़िले मक़सूद तुम्हारे सामने है और साअते मौत तुम्हारे तआक़ब में है और तुम्हें अपने साथ लेकर चल रही है। अपना बोझ हल्का कर लो -1- ताके पहले वालों से मुलहक़ हो जाओ के अभी तुम्हारे साबेक़ीन से तुम्हारा इन्तेज़ार कराया जा रहा है।

सय्यद रज़ी- – इस कलाम का कलामे ख़ुदा व कलामे रसूल (स) के बाद किसी कलाम के साथ रख दिया जाए तो इसका पल्ला भारी ही रहेगा और यह सबसे आगे निकल जाएगा। ‘‘तख़फ़फ़वा तलहक़वा’’ से ज्यादा मुख़्तसर और बलीग़ कलाम तो कभी देखा और सुना ही नहीं गया है। इस कलमे में किस क़द्र गहराई पाई जाती है और इस हिकमत का चश्मा किस क़द्र शफ़फाफ़ है। हमने किताबे ख़साएस में इसकी क़द्र व क़ीमत और अज़मत व शराफ़त पर मुकम्मल तब्सिरा किया है।

(( इसमें कोई शक नहीं है के गुनाह इन्सानी ज़िन्दगी के लिए एक बोझ की हैसियत रखता है और यही बोझ है जो इन्सान को आगे नहीं बढ़ने देता है और वह इसी दुनियादारी में मुब्तिला रह जाता है वरना इन्सान का बोझ हल्का हो जाए तो तेज़ क़दम बढ़ाकर उन साबेक़ीन से मुलहक़ हो सकता है जो नेकियों की तरफ़ सबक़त करते हुए बलन्दतरीन मन्ज़िलों तक पहुंच गये हैं। अमीरूल मोमेनीन (अ) की दी हुई यह मिसाल वह है जिसका तजुरबा हर इन्सान की ज़िन्दगी में बराबर सामने आता रहता है के क़ाफ़िले में जिसका बोझ ज़्यादा होता है वह पीछे रह जाता है और जिसका बोझ हल्का होता है वह आगे बढ़ जाता है। सिर्फ़ मुश्किल यह है के इन्सान को गुनाहों के बोझ होने का एहसास नहीं है। शायर ने क्या ख़ुब कहा है-   चलने न दिया बारे गुनह न पैदल   ताबूत में कान्धों पे सवार आया हूँ। ))

22- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जब आपको ख़बर दी गई के कुछ लोगों ने आपकी बैअत तोड़ दी है)

आगाह हो जाओ के शैतान ने अपने गिरोह को भड़काना शुरू कर दिया है और फ़ौज को जमा कर लिया है ताके ज़ुल्म अपनी मन्ज़िल पर पलट आए और बातिल अपने मरकज़ की तरफ़ वापस आ जाए। ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने मुझ पर कोई सच्चा इल्ज़ाम लगाया है और न मेरे और अपने दरम्यान कोई इन्साफ़ किया है। यह मुझसे उस हक़ का मुतालबा कर रहे हैं जो ख़ुद इन्होंने नज़रअन्दाज़ किया है और उस ख़ून का तक़ाज़ा कर रहे हैं जो ख़ुद इन्होंने बहाया है। फ़िर अगर मैं इनके साथ शरीक था तो इनका भी तो एक हिस्सा था और वह तन्हा मुजरिम थे तो ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। बेषक इनकी अज़ीमतरीन दलील भी इन्हीं के खि़लाफ़ है। यह उस माँ से दूध पीना चाहते हैं जिसका दूध ख़त्म हो चुका है और उस बिदअत को ज़िन्दा करना चाहते हैं जो मर चुकी है। हाए किस क़दर नामुराद यह जंग का दाई है। कौन पुकार रहा है और किस मक़सद के लिये इसकी बात सुनी जा रही है? मैं इस बात से ख़ुष हू के परवरदिगार की हुज्जत इनपर तमाम हो चुकी है और वह इनके हालात से बाख़बर है।

अब अगर इन लोगों ने हक़ का इन्कार किया है तो मैं इन्हें तलवार की बाढ़ अता करूंगा के वही बातिल की बीमारी से षिफ़ा देने वाली और हक़ की वाक़ई मददगार है। हैरतअंगेज़ बात है के यह लोग मुझे नेज़ाबाज़ी के मैदान में निकलने और तलवार की जंग सहने की दावत दे रहे हैं- रोने वालियां इनके ग़म में रोएं। मुझे तो कभी भी जंग से ख़ौफ़ज़दा नहीं किया जा सका है और न मैं शमषीरज़नी से मरऊब हुआ हूँ। मैं तो अपने परवरदिगार की तरफ़ से मन्ज़िले यक़ीन पर हँ और मुझे दीन के बारे में किसी तरह कोई शक नहीं है।

((तारीख़ का मसला है के उस्मान ने अपने दौरे हुकूमत में अपने पेषरौ तमाम हुक्काम के खि़लाफ़ अक़रबा परस्ती और बैतुलमाल की बे-बुनियाद तक़सीम का बाज़ार गर्म कर दिया था और यही बात उनके क़त्ल का बुनियादी सबब बन गयी। ज़ाहिर है के उनके क़त्ल के बाद यह बिदअत भी मुरदा हो चुकी थी लेकिन तलहा ने अमीरूलमोमेनीन (अ) से बसरा की गवरनरी और ज़ुबैर ने कूफ़े की गवरनरी का मतालबा करके फिर इस बिदअत को ज़िन्दा करना चाहा जो एक इमामे मासूम (अ) किसी क़ीमत पर बरदाष्त नहीं कर सकता है चाहे उसकी कितनी ही बड़ी क़ीमत क्यों न अदा करना पड़े।

इब्ने अबीअलहदीद के नज़दीक दाई से मुराद तलहा, ज़ुबैर और आईशा हैं जिन्होंने आप (अ) के खि़लाफ़ जंग की आग भड़काई थी लेकिन अन्जाम कार सबको नाकाम और नामुराद होना पड़ा और कोई नतीजा हाथ न आया जिसकी तरफ़ आपने तहक़ीर आमेज़ लहजे में इषारा किया है और साफ़ वाज़ेअ कर दिया है के मैं जंग से डरने वाला नहीं हूँ, तलवार मेरा तकिया है और यक़ीन मेरा सहारा। इसके बाद मुझे किस चीज़ से ख़ौफ़ज़दा किया जा सकता है।))

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Nahjul Balagha- ख़ुत्बा 1 – 4 (HINDI)

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम (अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) के मुन्तख़ब ख़ुतबात का सिलसिला-ए-कलाम)

1- आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा  (जिसमें आसमान व ज़मीन की खि़ल्क़त की इब्तेदा और खि़ल्क़त-ए-आदम (अ.स.) के तज़किरे के साथ हज्जे बैतुल्लाह की अज़्मत का भी ज़िक्र किया गया है) यह ख़ुत्बा हम्द-व-सनाए परवरदिगार, खि़ल्क़ते आलम, तख़लीक़े मलाएका, इन्तेख़ाबे अम्बिया, बअसत सरकारे दो आलम (स.), अज़मते क़ुरान और मुख़्तलिफ़ एहकामे शरइया पर मुष्तमिल है।

सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जिसकी मिदहत तक बोलने वालों के तकल्लुम की रसाई नहीं है और इसकी नेमतों को गिनने वाले शुमार नहीं कर सकते हैं। इसके हक़ को कोषिष करने वाले भी अदा नहीं कर सकते हैं। न हिम्मतों की बुलन्दियां इसका इदराक कर सकती हैं और न ज़ेहानतों की गहराइयां इसकी तह तक जा सकती हैं। इसकी सिफ़त ज़ात के लिये न कोई मुअय्यन हद है न तौसीफ़ी कलेमात। न मुक़र्ररा वक़्त है और न आखि़री मुद्दत। इसने तमाम मख़लूक़ात को सिर्फ़ अपनी क़ुदरते कामेला से पैदा किया है और फिर अपनी रहमत ही से हवाएं चलाई हैं और ज़मीन की हरकत को पहाड़ों की मीख़ों से संभाल रखा है। दीन की इब्तेदा इसकी मआरेफ़त से है और मआरेफ़त का कमाल इसकी तसदीक़ से है, तसदीक़ का कमाल तौहीद का इक़रार है और तौहीद का कमाल इख़लास अक़ीदा है और इख़लास का कमाल ज़ाएद बर ज़ात सिफात की नफ़ी है के सिफ़त का मफ़हूम ख़ुद ही गवाह है के वह मौसूफ़ से अलग कोई शै है और मौसूफ़ का मफ़हूम ही यह है के वह सिफ़त से जुदागाना कोई ज़ात है। इस के लिए अलग से सिफ़ात का असबात एक शरीक का असबात है और इसका लाज़मी नतीजा ज़ात का ताअदद है और ताअदद का मक़सद इसके लिए अजज़ाअ का अक़ीदा है और अजज़ाअ का अक़ीदा सिर्फ़ जिहालत है मआरेफ़त नहीं है और जो बेमआरेफ़त हो गया उसने इषारा करना ‘शुरूकर दिया और जिसने इसकी तरफ़ इषारा किया उसने इसे एक सिम्त में महदूद कर दिया और जिसने महदूद कर दिया उसने इसे गिनती का एक शुमार कर लिया (जो सरासर खि़लाफ़े तौहीद ज़ात है)।

जिसने यह सवाल खड़ा किया के वह किस चीज़ में है उसने इसे किसी के ज़हन में क़रार दे दिया और जिसने यह कहा के वह किसके ऊपर क़ाएम है उसने नीचे का इलाक़ा ख़ाली करा लिया। इसकी हस्ती हादिस नहीं है और इसका वजूद अदम की तारीकियों से नहीं निकला है। वह हर शै के साथ है लेकिन मिल कर नहीं, और हर शै से अलग है लेकिन जुदाई की बुनियाद पर नहीं। वह फाएल है लेकिन हरकात व आलात के ज़रिये नहीं और वह उस वक़्त भी बसीर था जब देखी जाने वाली मख़लूक़ का पता नहीं था। वह अपनी ज़ात में बिलकुल अकेला है और इसका कोई ऐसा साथी नहीं है जिसको पाकर उन्स महसूस करे और खोकर परेषान हो जाने का एहसास करे।

ख़ुत्बे का पहला हिस्सा ज़ाते वाजिब की अज़मतों से मुताल्लिक है जिसमें इसकी बुलन्दियों और गहराईयों के तज़किरे के साथ इसकी पायां नेमतों की तरफ़ भी इषारा किया गया है और यह वाज़ेअ किया गया है के इसकी ज़ाते मुक़द्दस ला महदूद है और इसकी इब्तेदा व इन्तेहा का तसव्वुर भी मुहाल है। अलबत्ता इसके अहानात की फ़ेहरिस्त में सरे फेहरिस्त तीन चीज़ें हैं-

  1. उसने अपनी क़ुदरते कामेला से मख़लूक़ात को पैदा किया है।
  2. उसने अपनी रहमते शामला से साँस लेने के लिए हवाएं चलाई हैं।
  3. इन्सान के क़रार व इस्तेक़रार के लिए ज़मीन की थरथराहट को पहाड़ों की मेख़ों के ज़रिये रोक दिया है वरना इनसान का एक लम्हा भी खड़ा रहना मुहाल हो जाता और इसके हर लम्हे गिर पड़ने और उलट जाने का इमकान बरक़रार रहता।

दूसरे हिस्से में दीन व मज़हब का ज़िक्र किया गया है के जिस तरह कायनात का आग़ाज़ ज़ाते वाजिब से है उसी तरह दीन का आग़ाज़ भी इसकी मआरेफ़त से होता है और मआरेफ़त में हस्बे ज़ैल उमूर का लेहाज़ रखना ज़रूरी है। दिल व जान से इसकी तस्दीक़ की जाए। फ़िक्रो नज़र से इसकी वहदानियत का इक़रार किया जाए और ख़ालिक़ व मख़लूक़ के इम्तेयाज़ इसके सिफ़ात को ऐन ज़ात तसव्वुर किया जाए वरना हर ग़लत अक़ीदा इन्सान को इस जेहालत से दो चार कर देगा और हर महमल सवाल के नतीजे में मआरेफ़त से ‘शुरूहोने वाला सिलसिला जेहालत पर तमाम होगा और यह बदबख़्ती की आख़री मन्ज़िल है। इसकी अज़्मत के साथ इस नुक्ते का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है के वह जुमला आमाल की निगरानी कर रहा है और अपनी यकताई में किसी के वहम व गुमान का मोहताज नहीं है। इसने मख़लूक़ात को अज़ ग़ैब ईजाद किया और इनकी तख़लीक़ की इब्तेदा की बग़ैर किसी फ़िक्र की जूलानी के और बग़ैर किसी तजुरबे से फ़ायदा उठाए हुए या हरकत की ईजाद किये हुए या नफ़्स के उफ़्कार की उलझन में पड़े हुए। तमाम अषयाअ को इनके औक़ात के हवाले कर दिया और फ़िर इनके इख़्तेलाफ़ात में तनासब पैदा कर दिया। सब की तबीयतें मुक़र्रर कर दीं और फ़िर इन्हें शक्लें अता कर दीं। इसे यह तमाम बातें ईजाद के पहले से मालूम थीं और वह उनके हुदूद और उनकी इन्तेहा को ख़ूब जानता था। उसे हर शै के ज़ाती एतराफ़ आ भी इल्म था और इसके साथ शामिल हो जाने वाली अष्याअ का भी इल्म था।

इसके बाद उसने फ़िज़ा की वुस्अतें, इसके एतराफ व एकनाफ़ और हवाओं के तबक़ात ईजाद किये और  उनके दरम्यान वह पानी बहा दिया जिसकी लहरों में तलातुम था और जिसकी मौजें तह ब तह थीं और उसे एक तेज़ व तन्द हवा के कान्धे पर लाद दिया और फिर हवा को उलटने पलटने और रोक कर रखने का हुक्त दे दिया और इसकी हदों को पानी की हदों से यूँ मिला दिया के नीचे हवा की वुसअतें थीं और ऊपर पानी का तलातुम।

इसके बाद एक और हवा ईजाद की जिसकी हरकत में कोई तौलीदी सलाहियत नहीं थी और इसे मरकज़ पर रोक कर इसके झोंकों को तेज़ कर दिया और इसके मैदान को वसीअतर बना दिया और फ़िर उसे हुक्म दिया के इस बहरज़खार को मथ डाले और मौजूद को उलट पलट कर दे। चुनांचे इसने सारे पानी को एक मष्कीज़ह की तरह मथ डाला और उसे फ़िज़ाए बसीत में इस तरह लेकर चली के अव्वल को आखि़र पर उलट दिया और साकिन को मुतहर्रिक पर पलट दिया और इसके नतीजे में पानी की एक सतह बलन्द हो गई और इसके ऊपर एक झाग की तह बन गई। फिर इस झाग को फैली हुई हवा और खुली हुई फ़िज़ा में बलन्द कर दिया और इससे सात आसमान पैदा कर दिये जिसकी निचली सतह एक ठहरी हुई मौज की तरह थी और ऊपर का हिस्सा एक महफ़ूज़ सिक़त और बलन्द इमारत के मानिन्द था। न इसका कोई सतून था जो सहारा दे सके और न कोई बन्धन था जो मुनज़्ज़म कर सके।

फ़िर उन आसमानों को सितारों की ज़ीनत से मुजय्यन किया और उनमें ताबन्दह नजूम की रौषनी फैला दी और उनके दरमियान एक ज़ौफ़गन चिराग़ और एक रौषन माहताब रवां कर दिया जिसकी हरकत एक घूमने वाले फ़लक और एक मुतहर्रक छत और जुम्बिष करने वाली तख़्ती में थी।

तख़्लीक़े कायनात के बारे में अब तक जो नज़रियात सामने आए हैं इनका ताल्लुक़ दो मौज़ूआत से हैः

एक मौज़ू यह है के इस कायनात का मादा क्या है? तमाम अनासर अरबह हैं या सिर्फ़ पानी से यह कायनात ख़ल्क़ हुई है या कुछ दूसरे अनासर अरबह भी कार फ़रमा थे या किसी गैस से यह कायनात पैदा हुई है या किसी भाप और कोहरे ने इसे जनम दिया है, दूसरा मौज़ू यह है के इसकी तख़लीक़ वफ़अतन हुई है या यह क़दर रेज आलमे वजूद में आई है और इसकी उम्र दस बिलयन साल है 60 हज़ार बिलयन साल है?

चुनान्चे हर शख़्स ने अपने अन्दाज़े के मुताबिक़ एक राय क़ाएम की है और उसी राय की बिना पर इसे मोहक़्िक़ का दरजा दिया गया है। हालांके हक़ीक़ते अम्र यह है के इस क़िस्म के मौज़ूआत में तहक़ीक़ का कोई इमकान नहीं है और न कोई हतमी राय क़ायम की जा सकती है। सिर्र्फ़ अन्दाज़े हैं जिन पर सारा कारोबार चल रहा है और ऐसे माहौल में हर शख़्स को एक नई राय क़ायम करने का हक़ है और किसी को यह चैलेन्ज करने का हक़ नहीं है के यह राय आलात और वसाएल से पहले की है लेहाज़ा इसकी कोई क़ीमत नहीं है।

अमीरूल मोमेनीन (अ.स.) ने अस्ल कायनात पानी को क़रार दिया है और इसी की तरफ़ क़ुरआन मजीद ने भी इषारा किया है और आपकी राय दीगर आराय के मुक़ाबले में इसलिये भी अहमियत रखती है के इसकी बुनियाद तहक़ीक़, इन्केषाफ़, तजुरबा और अन्दाज़ा पर नहीं है बल्कि यह इस मालिक का दिया हुआ बेपनाह इल्म है जिसने इस कायनात को बनाया है और खुली बात है के मालिक से ज़्यादा मख़लूक़ात से बाख़बर और कौन हो सकता है।

अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने अपने बयान में तीन नुकात की तरफ़ तवज्जोह दिलाई है (1) असल कायनात पानी है और पानी को क़ाबिले इस्तेमाल हवा ने बनाया है। (2) इस फ़िज़ाए बेसत के तीन रूख़ हैं, बलन्दी जिसको अजवाए कहा जाता है और एतराफ़ जिसे इरजार से ताबीर किया जाता है और तबक़ात जिन्हें सकाइक का नाम दिया जाता है, आम तौर से ओलमाए फलक को अकब के हर मजमूए को सिक्कह का नाम देते हैं जिसमें एक अरब से ज़्यादा सितारे पाए जाते हैं जिस तरह के हमारे अपने निज़ाम शम्सी का हाल है के इसमें एक अरब से ज़्यादह सितारों का इन्केषाफ़ किया जा चुका है।  (3) आसमानी मख़लूक़ात में एक मरकज़ी शै है जिसे इसकी हरकत की बिना पर चिराग़ कहा जाता है और एक इसके गिर्द हरकत करने वाली ज़मीन है और एक ज़मीन के गिर्द हरकत करने वाला सितारा है जिसे क़मर कहा जाता है और ओलमाए फ़लक इस ताबेअ दर ताबेअ को क़मर कहते हैं कोकब नहीं कहते हैं।

फिर इसने बलन्द तरीन आसमानों के दरमियान षिगाफ़ पैदा किये और इन्हें तरह तरह के फ़रिष्तों से भर दिया जिनमें से बाज़ सजदे में हैं तो रूकूअ की नौबत नहीं आती है और बाज़ रूकूअ में हैं तो सर नहीं उठाते हैं और बाज़ सफ़ बान्धे हुए हैं तो अपनी जगह से हरकत नहीं करते हैं बाज़ मषग़ूले तस्बीह हैं तो खस्ताहाल नहीं होते हैं। सब के स बवह हैं के न इनकी आँखों पर नीन्द का ग़लबा होता है और न अक़्लों पर सहो व निस्यान का, न बदन में सुस्ती पैदा होती है और न दिमाग़ में निस्यान की ग़फ़लत।

इनमें से बाज़ को वही का अमीन और रसूलों की तरफ़ क़ुदरत की ज़बान बनाया गया है जो इसके फ़ैसलों और एहकाम को बराबर लाते रहते हैं और कुछ इस के बन्दों के मुहाफ़िज़ और जन्नत के दरवाज़ों के दरबान हैं और बाज़ वह भी हैं जिनके क़दम ज़मीन के आखि़री तबक़े में साबित हैं और गर्दनें बलन्दतरीन आसमानों से भी बाहर निकली हुई हैं। इनके एतराफ़ बदन इक़तारे आलम से वसीअतर हैं और इनके कान्धे पर पायहाए अर्ष के उठाने के क़ाबिल हैं। इनकी निगाहें अर्षे इलाही के सामने झुकी हुई हैं और वह इसके नीचे परों को समेटे हुए हैं। उनके और दीगर मख़लूक़ात के दरमियान इज़्ज़त के हिजाब और क़ुदरत के पर्दे हाएल हैं। वह अपने परवरदिगार के बारे में शक्ल व सूरत का तसव्वुर भी नहीं करते हैं और न इसके हक़ में मख़लूक़ात के सिफ़ात को जारी करते हैं। वह न इसे मकान में महदूद करते हैं और न इसकी तरफ़ इषबाह व नज़ाएर से इषारह करते हैं।

तख़लीक़े जनबा आदम (अ) की कैफ़ियत

इसके बाद परवरदिगार ने ज़मीन के सख़्त व नरम और शूर व शीरीं हिस्सों से ख़ाक को जमा किया और इसे पानी से इस क़दर भिगोया के बिल्कुल ख़ालिस हो गयी और फ़िर तरी में इस क़दर गूंधा के लसदार बन गई और इसे एक ऐसी सूरत बनाई जिसमें मोड़ भी थे और जोड़ भी। आज़ा भी थे और जोड़बन्द भी, फिर इस क़दर सुखाया के मज़बूत हो गई और इस क़द्र सख़्त किया के खनखनाने लगी और यह सूरते हाल एक वक़्ते मुअय्यन और मुद्दत-ए-ख़ास तक बरक़रार रही जिसके बाद इसमें मालिक ने अपनी रूहे कमाल फूंक दी और इसे ऐसा इन्सान बना दिया जिसमें ज़ेहन की जूलानियां भी थीं और फ़िक्र के तसर्रूफात भी काम करने वाले आज़ा व जवारेह भी थे और हरकत करने वाले अददात व आलात भी, हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाली मारेफ़त भी थी और मुख़्तलिफ़ ज़ाएक़ों, ख़ुषबुओं, रंग व रोग़न में तमीज़ करने की सलाहियत भी। इसे मुख़्तलिफ़ क़िस्म की मिट्टी से बनाया गया जिसमें मवाफ़िक़ अजज़ा भी पाए जाते थे और मुतज़ात अनासिर भी और गरमी, सरदी, तरी ख़ुष्की जैसे कैफ़ियात भी।

फ़िर परवरदिगार ने मलाएका से मतालेबा किया के इसकी अमानत को वापस करें और इसकी ममहूदह वसीयत पर अमल करें यानी इस मख़लूक़ के सामने सर झुका दें और इसकी करामत का इक़रार कर लें। चुनांचे इसने साफ़ साफ़ एलान कर दिया के आदम को सजदा करो और सबने सजदा भी कर लिया सिवाए इबलीस के, के उसे ताअस्सुब ने घेर लिया और बदबख़्ती ग़ालिब आ गई और इसने आग की खि़ल्क़त को वजह-ए-इज़्ज़त और ख़ाक की खि़ल्क़त को वजह-ए-ज़िल्लत क़रार दे दिया। मगर परवरदिगार ने उसे ग़ज़बे इलाही के मुकम्मल इस्तहक़ाक़, आज़माइष की तकमील और अपने वादे को पूरा करने के लिये यह कहकर मोहलत दे दी के तुजे रोज़ वक़्ते मआलूम तक के लिये मोहलत दी जा रही है।

ऐ इन्सान की कमज़ोरी के सिलसिले में इतना ही काफ़ी है के अपनी असल के बारे में इतना भी मालूम नहीं है जितना दूसरी मख़लूक़ात के बारे में इल्म है। वह न अपने मादा की असल से बाख़बर है और न अपनी रूह की हक़ीक़त से। मालिक ने इसे मुतज़ाद अनासिर से ऐसा जामेअ बना दिया है के जिस्मे सग़ीर में आलमे अकबर समा गया है और बक़ौल शख्से इसमें जमादात अजया कोन व फ़साद, नबातात जैसा नमू, हैवान जैसी हरकत और मलाएका जैसी इताअत व हयात सब पाई जाती है और औसाफ़ के ऐतबार से भी इसमें कुत्ते जैसी ख़ुषामद, मकड़ी जैसे ताने बाने, क़न्ज़र जैसे अस्लहे, परिन्दों जैसा तहफ़्फ़ुज़, हषरातुल अर्ज़ जैसा तहफ़्फ़ुज़, हिरन जैसी उछल कूद, चूहे जैसी चोरी, मोर जैसा ग़ुरूर, ऊंट जैसा कीना ख़च्चर जैसी शरारत, बुलबुल जैसा तरन्नुम, बिच्छू जैसा डंक, सब कुछ पाया जाता है।

इसके बाद परवरदिगार ने आदम (अ) को एक ऐसा घर में साकिन कर दिया जहां ज़िन्दगी ख़ुष गवार और मामून व महफ़ूज़ थी और फिर इन्हें इबलीस और इसकी अदावत से भी बाख़बर कर दिया। लेकिन दुष्मन ने इनके जन्नत के क़याम और नेक बन्दों की रिफ़ाक़त से जल कर इन्हें धोका दे दिया और इन्होंने भी अपने यक़ीने मोहकम को शक और अज़्मे मुस्तहकम को कमज़ोरी के हाथों फ़रोख़्त कर दिया और इस तरह मसर्रत के बदले ख़ौफ़ को ले लिया और इबलीस के कहने में आकर निदामत का सामान फ़राहम कर लिया। फिर परवरदिगार ने इनके लिये तौबा का सामान फ़राहम कर दिया और अपने कलेमाते रहमत की तलक़ीन कर दी और इनसे जन्नत में वापसी का वादा करके इन्हें आज़माइष की दुनिया में उतार दिया जहां नस्लों का सिलसिला क़ायम होने वाला था।

अम्बिया-ए-कराम का इन्तेख़ाब

इसके बाद उसने इनकी औलाद में से इन अम्बियाओं का इन्तेख़ाब किया जिनसे वही की हिफ़ाज़त और पैग़ाम की तबलीग़ की अमानत का अहद लिया इसलिये के आखि़री मख़लूक़ात ने अहदे इलाही को तबदील कर दिया था। इसके हक़ से नावाक़िफ़ हो गये थे। इसके साथ दूसरे ख़ुदा बना लिये थे और शैतान ने इन्हें मआरेफ़त की राह से हटाकर इबादत से यकसर जुदा कर दिया था।

परवरदिगार ने इनके दरमियान रसूल भेजे, अम्बिया का तसलसुल क़ाएम किया ताके वह उनसे फ़ितरत की अमानत को वापस लें और इन्हें भूली हुई नेमतों परवरदिगार को याद दिलाएं। तबलीग़ के ज़रिये इन पर तमाम हुज्जत करें और इनकी अक़्ल के दफ़ीफ़ों को बाहर लाएं और उन्हें क़ुदरते इलाही की निषानियां दिखलाईं। यह सदों पर बलन्दतरीन छत, यह ज़ेरे क़दम गहवारा, यह ज़िन्दगी के असबाब, यह फ़ना करने वाली अजल, यह बूढ़ा बना देने वाले इमराज़ और यह पै दर पै पेष आने वाले हादसात।

इसने कभी अपनी मख़लूक़ात को नबीए मुरसल या किताब मुनज़्ज़ल या हुज्जतल अज़्म या तरीक़ वाज़ेअ से महरूम नहीं रखा है। ऐसे रसूल भेजे हैं जिन्हें न अदद की क़िल्लत काम से रोक सकती थी और न झुटलाने वालों की कसरत, इनमें जो पहले था उसे बाद वाले का हाल मालूम था और जो बाद में आया उसे पहले वाले ने पहुंचवा दिया था और यूं ही सदियां गुज़रती रहीं औश्र ज़माने बीतते रहे। आबा व अजदाद जाते रहे और औलाद व अहफ़ाद आते रहे।

बअसत रसूले अकरम (स0)

यहां तक के मालिक ने अपने वादे को पूरा करने और अपने नबूवत को मुकम्मल करने के लिये हज़रत मोहम्मद (स0) को भेज दिया जिनके बारे में अम्बिया से अहद लिया जा चुका था और जिनकी अलामतें मषहूर और विलादत मसऊद व मुबारक थी। इस वक़्त अहले ज़मीन मुतफ़र्रिक़ मज़ाहिब, मुन्तषिर ख़्वाहिषात और मुख़्तलिफ़ रास्तों पर गामज़न थे। कोई ख़ुदा को मख़लूक़ात की शबीह बता रहा था। कोई इसके नामों को बिगाड़ रहा था, और कोई दूसरे ख़ुदा का इषारा दे रहा था। मालिक ने आपके ज़रिये सबको गुमराही से हिदायत दी और जेहालत से बाहर निकाल लिया।

इसके बाद उसने आपकी मुलाक़ात को पसन्द किया और इनआमात से नवाज़ने के लिये इस दारे दुनिया से बलन्द कर लिया। आपको मसाएब से निजात दिला दी और निहायत एहतेराम से अपनी बारगाह में तलब कर लिया और उम्मत में वैसा ही इन्तेज़ाम कर दिया जैसा के दीगर अम्बिया ने किया था के उन्होंने भी क़ौम को लावारिस नहीं छोड़ा था जिसके लिये कोई वाज़ेए रास्ता और मुस्तहकम निषान न हो।

क़ुरआन और एहकामे शरीया

उन्होंने तुम्हारे दरमियान तुम्हारे परवरदिगार की किताब को छोड़ा है जिसके हलाल व हराम फराएज़ व फ़ज़ाएल, नासिख़ व मन्सूख़, रूख़सत व अज़ीमत, ख़ास व आम, इबरत व इमसाल, मुतलक़ व मुक़ीद, मोहकम व मुतषाबेह सबको वाज़ेअ कर दिया था, मोजमल की तफ़सीर कर दी थी, गुत्थियों को सुलझा दिया था। इसमें बाज़ आयात हैं जिनके इल्म का अहद लिया गया है और बाज़ से नावाक़फ़ीयत को मुआफ़ कर दिया गया है। बाज़ एहकाम के फ़र्ज़ का किताब में ज़िक्र किया गया है और सुन्नत से इनके मनसूख़ होने का इल्म हासिल हुआ है। या सुन्नत में इनके वजूब का ज़िक्र हुआ है जबके किताब में तर्क करने की आज़ादी का ज़िक्र था, बाज़ एहकाम एक वक़्त में वाजिब हुए हैं और मुस्तक़बिल में ख़त्म कर दिये गए हैं। इसके मोहर्रमात में बाज़ पर जहन्नुम की सज़ा सुनाई गई है और बाज़ गुनाहे सग़ीरा हैं जिनकी बख़्िषष की उम्मीद दिलाई गई है। बाज़ एहकाम हैं जिनका मुख़्तसर भी क़ाबिले क़ुबूल है और ज़्यादा की भी गुन्जाइष पाई जाती है।

ज़िक्रे बैतुल्लाह

परवरदिगार ने तुम लोगों पर हज्जे बैतुलहराम को वाजिब क़रार दिया है जिसे लोगों के लिये क़िबला बनाया है और जहां लोग प्यासे जानवरों की तरह बे ताबाना वारिद होते हैं और वैसा उन्स रखते हैं जैसे कबूतर अपने आषियाने से रखता है। हज्जे बैतुल्लाह को मालिक ने अपनी अज़मत के सामने झुकने की अलामत और अपनी इज़्ज़त के ईक़ान की निषानी क़रार दिया है। इसने मख़लूक़ात में से इन बन्दों का इन्तेख़ाब किया है जो इसकी आवाज़ सुन कर लब्बैक कहते हैं और उसके कलेमात की तसदीक़ करते हैं। उन्होंने अम्बिया के मवाफ़िक़ में वक़ूफ़ किया है और तवाफ़ अर्ष करने वाले फ़रिष्तों का अन्ताज़ अख़्ितयार किया है। यह लोग अपनी इबादत के मुआमले में बराबर फ़ायदे हासिल कर रहे हैं और मग़फ़ेरत की वादागाह की तरफ़ तेज़ी से सबक़त कर रहे हैं।

परवरदिगार ने काबे को इस्लाम की निषानी और बेपनाह अफ़राद की पनाहगाह क़रार दिया है। इसके हज को फ़र्ज़ किया है और इसके हक़ को वाजिब क़रार दिया है। तुम्हारे ऊपर उस घर की हाज़िरी को लिख दिया है और साफ़ ऐलान कर दिया है के ‘‘अल्लाह के लिये लोगों की ज़िम्मादारी है के इसके घर का हज करें जिसके पास भी इस राह को तय करने की इस्तेताअत पाई जाती हो।’’

 2- सिफ़्फ़ीन से वापसी पर आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

जिसमें बाअसते पैग़म्बर के वक़्त लोगों के हालात आले रसूल (स0) के औसाफ़ और दूसरे अफ़राद के कैफ़ियात का ज़िक्र किया गया है।

मैं परवरदिगार की हम्द करता हूँ इसकी नेमतों की तकमील के लिये और इसकी इज़्ज़त के सामने सरे तस्लीम ख़म करते हुए हैं इसकी नाफ़रमानी से तहफ़्फ़ुज़ चाहता हूँ और इससे मदद मांगता हूँ के मैं इसी की किफ़ायत व किफ़ालत का मोहताज हूँ। वह जिसे हिदायत दे दे वह गुमराह नहीं हो सकता है और जिसका वह दुष्मन हो जाए उसे कहीं पनाह नहीं मिल सकती है।

जिसके लिये वह काफ़ी हो जाए वह किसी का मोहताज नहीं है। इस हम्द का पल्ला हर बावज़न शै से गरांतर है और यह सरमाया हर ख़ज़ाने से ज़्यादा क़ीमती है। मैं गवाही देता हूँ के अल्लाह एक है, उसका कोई शरीक नहीं है और यह वह गवाही है, जिसके इख़लास का इम्तेहान हो चुका है और जिसका निचोड़ अक़ीदे का जुज़ बन चुका है। मैं इस गवाही से ताहयात वाबस्ता रहूँगा और इसी को रोज़े क़यामत के हौलनाक मराहेल के लिये ज़ख़ीरा बनाऊंगा। यही ईमान की मुस्तहकम बुनियाद है और यही नेकियों का आग़ाज़ है और इसी में रहमान की मरज़ी और शैतान की तबाही का राज़ मुज़म्मर है।

और मैं गवाही देता हूँ के मोहम्मद (स0) अल्लाह के बन्दे और इसके रसूल हैं। उन्हें परवरदिगार ने मषहूर दीन, मासूर निषानी, रोषन किताब, ज़िया-ए-पाष नूर, चमकदार रौषनी और वाज़ेह अम्र के साथ भेजा है ताके शुबहात ज़ाएल हो जाएं और दलाएल के ज़रिये हुज्जत तमाम की जा सके, आयात के ज़रिये होषियार बनाया जा सके और मिसालों के ज़रिये डराया जा सके।

यह बअसत उस वक़्त हुई है जब लोग ऐसे फ़ितनों में मुब्तिला थे जिनसे रीसमाने दीन टूट चुकी थी। यक़ीन के सुतून हिल गए थे। उसूल में शदीद इख़्तेलाफ़ था और उमूर में सख़्त इन्तेषार। मुष्किलात से निकलने के रास्ते तंग व तारीक हो गये थे। हिदायत गुमनाम थी और गुमराही बरसरे आम, रहमान की मआसियत हो रही थी और शैतान की नुसरत, ईमान यकसीर नज़रअन्दाज़ हो गया था, इसके सुतून गिर गए थे औश्र आसार नाक़ाबिले षिनाख़्त हो गए थे, रास्ते मिट गए थे और शहराहें बेनिषान हो गई थीं। लोग शैतान की इताअत में इसी के रास्ते पर चल रहे थे और इसी के चष्मों पर वारित हो रहे थे। उन्हीं की वजह से शैतान के परचम लहरा रहे थे और इसके अलम सरबलन्द थे। यह लोग ऐसे फ़ितनों में मुब्तिला थे जिन्होंने इन्हें पैरों तले रोन्द दिया था और समों से कुचल दिया था और ख़ुद अपने पन्जों के बल खड़े हो गए थे। यह लोग फ़ितनों में हैरान व सरगरदां और जाहिल व फ़रेब खा़ेरदा थे। परवरदिगार ने उन्हें इस घर (मक्का) में भेजा जो बेहतरीन मकान था, लेकिन बदतरीन हमसाए जिनकी नींद बेदारी थी और जिनका सुरमा आंसू, वह सरज़मीन जहाँ आलिम को लगाम लगी हुई थी और जाहिल मोहतरम था।

आले रसूले अकरम (स0)

यह लोग राज़े इलाही की मन्ज़िल और अम्रे दीन का मिलजा व मावा हैं। यही इल्मे ख़ुदा के मरकज़ और हुक्मे ख़ुदा की पनाहगाह हैं। किताबों ने यहीं पनाह ली है और दीन के यही कोहे गराँ हैं। उन्हीं के ज़रिये परवरदिगार ने दीन की पुष्त की कजी सीधी की है और उन्हीं के ज़रिये इसके जोड़ बन्द के राषे का इलाज किया है।

एक दूसरी क़ौम

उन लोगों ने फ़िजोर का बीज बोया है और इसे ग़ुरूर के पानी से सींचा है और नतीजे में हलाकत को काटा है। याद रखो के आले मोहम्मद (स0) पर इस उम्मत में किसी का क़यास नहीं किया जा सकता है और न इन लोगों को उनके बराबर क़रार दिया जा सकता है जिन पर हमेषा इनकी नेमतों का सिलसिला जारी रहा है। आले मोहम्मद (स0) दीन की असास और यक़ीन का सतून हैं। उनसे आगे बढ़ जाने वाला पलट कर उन्हीं की तरफ़ आता है और पीछे रह जाने वाला भी उन्हीं से आकर मिलता है। उनके पस हक़्क़े विलायत के ख़ुसूसियात हैं और इन्हीं के दरमियान पैग़म्बर (स0) की वसीयत और उनकी विरासत है।

अब जबके हक़ अपने अहल के पास वापस आ गया है और अपनी मन्ज़िल की तरफ़ मुन्तक़िल हो गया है।

3- आपके एक ख़ुतबे का हिस्सा (जिसे शक़षक़िया के नाम से याद किया जाता है)

आगाह हो जाओ के ख़ुदा की क़सम फ़ुलां शख़्स (इब्ने अबी क़हाफ़ा) ने क़मीस खि़लाफ़त को खींच तान कर पहन लिया है हालांकि इसे मालूम है के खि़लाफ़त की चक्की के लिये मेरी हैसियत मरकज़ी कील की है। इल्म का सैलाब मेरी ज़ात से गुज़र कर नीचे जाता है और मेरी बलन्दी तक किसी का ताएर-ए-फ़िक्र भी परवाज़ नहीं कर सकता है। फिर भी परवाज़ नहीं कर सकता है। फिर भी मैंने खि़लाफ़त के आगे परदा डाल दिया और इससे पहलू तही कर ली और यह सोचना ‘शुरूकर दिया के कटे हुए हाथों से हमला कर दूँ या इसी भयानक अन्धेरे पर सब्र कर लूँ जिसमें सिन रसीदा बिलकुल ज़ईफ़ हो जाए और बच्चा बूढ़ा हो जाए और मोमिन मेहनत करते करते ख़ुदा की बारगाह तक पहुंच जाए।

तो मैंने देखा के इन हालात में सब्र ही क़रीन-ए-अक़्ल है तो मैंने इस आलम में सब्र कर लिया के आँखों में मसाएब की खटक थी और गले में रन्ज व ग़म के फन्दे थे। मैं अपनी मीरास को लुटते देख रहा था। यहां तक के पहले ख़लीफ़ा ने अपना रास्ता लिया और खि़लाफ़त को अपने बाद फ़ुलाँ के हवाले कर दिया, बक़ौल आषया-

‘‘कहां वह दिन जो गुज़रता था मेरा ऊँटों पर, कहाँ यह दिन के मैं हय्यान के जवार में हूँ।’’ हैरत अंगेज़ बात तो यह है के वह अपनी ज़िन्दगी में इस्तीफ़ा दे रहा था और मरने के बाद के लिये दूसरे के लिए तय कर गया। बेषक दोनों ने मिलकर षिद्दत से इसके थनों को दोहा है और अब एक ऐसी दरष्त और सख़्त मन्ज़िल में रख दिया है जिसके ज़ख़्म कारी हैं और जिसको छूने से भी दरष्ती का एहसास होता है। लग़्िज़षों की कसरत है और माज़रतों की बोहतात।

 (( ख़ुत्बा शक़षक़िया के बारे में बाज़ मुतास्सिब और नाइन्साफ़ मुसन्नेफ़ीन ने यह फ़ितना उठाने की कोषिष की है के यह ख़ुत्बा अमीरूल मोमेनीन अ0 का नहीं है और इसे सय्यद रज़ी रह0 ने हज़रत अली अ0 के नाम से वाज़ेअ कर दिया है। हालांके यह बात रिवायत और विरायत दोनों के खि़लाफ़ है। रिवायत के ऐतेबार से इसके नाक़िल हज़रात में वह अफ़राद भी हैं जो सय्यद रज़ी रह0 की विलादत से पहले दुनिया से जा चुके हैं, और विरायत के एतबार से यह अन्दाज़े तन्क़ीद व तज़लम साहबे मुसीबत के अलावा दूसरा शख़्स इख़्तेयार ही नहीं कर सकता है और हर शख़्स को अपने ऊपर वारिद होने वाले मसाएब के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने का हक़ हासिल है फिर जबके सारे वाक़ेआत तारीख़ के मुसालमात में भी हैं तो इन्कार की क्या वजह हो सकती है। ख़लीफ़ए अव्वल का ज़बरदस्ती लिबासे खि़लाफ़त पहन लेना इस एतराफ़ के साथ के मैं तुम लोगों से बेहतर नहीं हूँ। मेरे साथ एक शैतान लगा रहता है। मुझे माफ कर दो। हज़रत अली अ0 का यह मरतबा के वह इल्मी सैलाब का सरचष्मा और इन्सानी फ़िक्र से बालातर शख़्िसयत हैं, आपका खि़लाफ़त से किनाराकष होकर सब्र व तहम्मुल की पॉलीसी पर अमल करना। अबूबक्र का इस्तीफ़ा के एलान के बाद भी उमर को नामज़द कर देना और दोनों का मुकम्मल तौर पर खि़लाफ़त से इस्तेफ़ादह करना और हज़रत उमर का दरष्त मिज़ाज होना वह तारीख़ी हक़ाएक़ हैं जिनसे इन्कार करने वाला नहीं पैदा हुआ है तो फिर किस बुनियाद पर ख़ुत्बे को जाली या ज़ई क़रार दिया जा रहा है और क्यों हक़ाएक़ की परदापोषी की नाकाम कोषिष की जा रही है। ))

इसको बरदाष्त करने वाला ऐसा ही है जैसे सरकष ऊंटनी का सवार के महार खींच ले तो नाक ज़ख़्मी हो जाए और ढील दे दे तो हलाकतों में कूद पड़े। तो ख़ुदा की क़सम लोग एक कजरवी, सरकषी, तलवन मिज़ाजी और बेराहरवी में मुब्तिला हो गए हैं और मैंने भी सख़्त हालात में तवील मुद्दत तक सब्र किया यहाँ तक के वह भी अपने रास्ते चला गया लेकिन खि़लाफ़त को एक जमाअत में क़रार दे गया जिनमें एक मुझे भी शुमार कर गया जबके मेरा इस शूरा से क्या ताअल्लुक़ था। मुझमें पहले दिन कौन सा ऐब व रैब देखा था के आज मुझे ऐसे लोगों के साथ मिलाया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद मैंने इन्हीं की फ़िज़ा में परवाज़ की और यह नज़दीक फ़िज़ा में उड़े तो वहाँ भी साथ रहा और ऊचे उड़े तो वहां भी साथ रहा मगर फिर भी एक शख़्स अपने कीने की बिना पर मुझ से मुनहरिफ़ हो गया और दूसरा दामादी की तरफ़ झुक गया और कुछ और भी नाक़ाबिले ज़िक्र असबाब व अषख़ास थे जिसके नतीजे में तीसरा शख़्स सरगीन और चारा के दरमियान पेट फुलाए हुए उठ खड़ा हुआ और इसके साथ इसके अहले ख़ानदान भी खड़े हो गए जो माले ख़ुदा को इस तरह हज़म कर रहे थे जिस तरह ऊंट बहार की घास को चर लेता है, यहां तक के इसकी बटी हुई रस्सी के बल खुल गए और उसके आमाल ने उसका ख़ात्मा कर दिया और षिकमपुरी ने मुंह के बल गिरा दिया।

इस वक़्त मुझे जिस चीज़ ने दहषत ज़दा कर दिया वह यह थी के लोग बिज्जू की गरदन के बाल की तरह मेरे गिर्द जमा हो गए और चारों तरफ से मेरे ऊपर टूट पड़े यहां तक के हसन (अ) व हुसैन (अ) कुचल गए और मेरी रिदा के किनारे फट गए। यह सब मेरे गिर्द बकरियों के गलह की तरह घेरा डाले हुए थे लेकिन जब मैंने ज़िम्मेदारी सम्भाली और उठ खड़ा हुआ तो एक गिरोह ने बैअत तोड़ दी और दूसरा दीन से बाहर निकल गया और तीसरे ने फिस्क़ इख़्तेयार कर लिया जैसे के इन लोगों ने यह इरषाद-ए-इलाही सुना ही नहीं है के ‘‘यह दारे आख़ेरत हम सिर्फ़ उन लोगों के लिये क़रार देते हैं जो दुनिया में बलन्दी और फ़साद नहीं चाहते हैं और आक़ेबत सिर्फ़ अहले तक़वा के लिये है।’’ हाँ हाँ ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने यह इरषाद सुना भी है और समझे भी हैं। लेकिन दुनिया उनकी निगाहों में आरास्ता हो गई और इसकी चमक दमक ने उन्हें लुभा लिया।

(( इसमें कोई शक नहीं है के उसमान के तसरफ़ात ने तमाम आलमे इस्लाम को नाराज़ कर दिया था। हज़रत आयषा उन्हें लोअसल यहूदी क़रार देकर लोगों को क़त्ल पर आमादा कर रही थीं। तलहा इन्हें वाजिबुल क़त्ल क़रार दे रहा था। ज़ुबैर दरपरदा क़ातिलों की हिमायत कर रहा था लेकिन इन सबका मक़सद उम्मते इस्लामिया को ना अहल से निजात दिलाना नहीं था बल्कि आइन्दा खि़लाफ़त की ज़मीन को हमवार करना था और हज़रत अली इस हक़ीक़त से मुकम्मल तौर पर बाख़बर थे। इसीलिये जब इन्क़ेलाबी गिरोह ने खि़लाफ़त की पेषकष की त आपने इन्कार कर दिया के क़त्ल का सारा इल्ज़ाम अपनी गरदन पर आ जाएगा और इस वक़्त तक क़ुबूल नहीं किया जब तक तमाम इन्सार व महाजेरीन ने इस अम्र का इक़रार नहीं कर लिया के आपके अलावा उम्मत का मुष्किलकुषा कोई नहीं है और इसके बाद भी मिम्बरे रसूल (स) पर बैठकर बैअत ली ताके जानषीनी का सही मफ़हूम वाज़े हो जाए। यह और बात है के इस वक़्त भी साद बिन अबी क़ास और अब्दुल्लाह बिन उमर जैसे अफ़राद ने बैअत नहीं की और हज़रत आएषा को भी जैसे ही इस ‘‘हादसे’’ की इत्तेलाअ मिली उन्होंने उस्मान की मज़लूमियत का एलान ‘शुरूकर दिया और तलहा व ज़ुबैर की महरूमी का इन्तेक़ाम लेने का इरादा कर लिया। आपके हज़रत अली (अ) से इख़्तेलाफ़ की एक बुनियाद यह भी थी के हुज़ूर (स) ने औलादे अली (अ) को अपनी औलाद क़रार दे दिया था और क़ुराने मजीद ने उन्हें अब्नाअना का लक़ब दे दिया था और हज़रत आएषा मुस्तक़िल तौर पर महरूमे औलाद थीं लेहाज़ा उनमें यह जज़्ब-ए-हसद पैदा होना ही चाहिए था।))

आगाह हो जाओ वह ख़ुदा गवाह है जिसने दाने को षिगाफ़्ता किया है और ज़ीरूह को पैदा किया है के अगर हाज़िरीन की मौजूदगी और अन्सार के वजूद से हुज्जत तमाम न हो गई होती और अल्लाह का अहले इल्म से यह अहद न होता के ख़बरदार ज़ालिम की षिकमपुरी और मज़लूम की गरन्गी पर चैन से न बैठना तो मैं आज भी इस खि़लाफ़त की रस्सी को इसी की गरदन पर डाल कर हका देता और इसके आखि़र को अव्वल ही के कासे से सेराब करता और तुम देख लेते के तुम्हारी दुनिया मेरी नज़र में बकरी की छींक से भी ज़ादा बेक़ीमत है।

कहा जाता है के इस मौक़े पर एक इराक़ी बाषिन्दा उठ खड़ा हुआ और उसने आपको एक ख़त दिया जिसके बारे में ख़याल है के इसमें कुछ फ़ौरी जवाब तलबे मसाएल थे। चुनान्चे आपने इस ख़त को पढ़ना ‘शुरूकर दिया और जब फ़ारिग़ हुए तो इब्ने अब्बास ने अर्ज़ की के हुज़ूर बयान जारी रहे। फ़रमाया के अफ़सोस इब्ने अब्बास यह तो एक शक़षक़ा था जो उभरकर दब गया।  (शक़षक़ा ऊंट के मुंह में वह गोष्त का लोथड़ा है जो ग़ुस्से और हैजान के वक़्त बाहर निकल आता है।)

इब्ने अब्बास कहते हैं के बख़ुदा क़सम मुझे किसी कलाम के नातमाम रह जाने का इस क़द्र अफ़सोस नहीं हुआ जितना अफ़सोस इस अम्र पर हुआ के अमीरूल मोमेनीन (अ) अपनी बात पूरी न फ़रमा सके और आपका कलाम नातमाम रह गया।

सैयद शरीफ़ (र) फ़रमाते हैं के अमीरूल मोमेनीन (अ) के इरषाद ‘‘इन शनक़लहा…….’’ का मफ़हूम यह है के अगर नाक़े पर मेहार खींचने में सख़्ती की जाएगी और वह सरकषी पर आमादा हो जाएगा तो उसकी नाक ज़ख़्मी हो जाएगी और अगर ढीला छोड़ दिया जाए तो इख़्तेयार से बाहर निकल जाएगा। अरब ‘‘अषनक़लनाक़ा’’ इसी मौक़े पर इस्तेमाल करते हैं जब इसके सर को मेहार के ज़रिये खींचा जाता है और वह सर उठा लेता है। इस कैफ़ियत को ‘‘षन्क़हा’’ से भी ताबीर करते हैं जैसा के इब्ने अलसकीत ने ‘‘इस्लाहलमन्तक़’’ में बयान किया है। लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ) ने इसमें एक ‘लाम‘ का इज़ाफ़ा कर दिया है ‘‘अषनक़लहा’’ के बाद के जुमले ‘‘असलस लहा’’ से हम आहंग हो जाए और फ़साहत का निज़ाम दरहम बरहम न होने पाए।

 4- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो फ़सीह तरीन कलेमात में शुमार होता है और जिसमें लोगों को नसीहत की गई है और इन्हें गुमराही से हिदायत के रास्ते पर लाया गया है।)

(तल्हा व ज़ुबैर की बग़ावत और क़त्ले उस्मान के पस मन्ज़र में फ़रमाया) तुम लोगों ने हमारी ही वजह से तारीकियों में हिदायत का रास्ता पाया है और बलन्दी के कोहान पर क़दम जमाए हैं और हमारी ही वजह से अन्धेरी रातों से उजाले की तरफ़ बाहर आए हो।

वह कान बहरे हो जाएं जो पुकारने वाले की आवाज़ न सुन सकें और वह लोग भला धीमी आवाज़ को क्या सुन सकेंगे जिनके कान बलन्द तरीन आवाज़ों के सामने भी बहरे ही रहे हों। मुतमईन दिल वही होता है जो यादे इलाही और ख़ौफ़े ख़ुदा में मुसलसल धड़कता रहता है। मैं रोज़े अव्वल से तुम्हारी ग़द्दारी के अन्जाम का इन्तेज़ाम कर रहा हूँ और तुम्हें फ़रेब ख़ोरदा लोगों के अन्दाज़ से पहचान रहा हूँ। मुझे तुमसे दीनदारी की चादर ने पोषीदा कर दिया है लेकिन सिद्क़ नीयत ने मेरे लिये तुम्हारे हालात को आईना कर दिया है। मैंने तुम्हारे लिये गुमराही की मन्ज़िलों में हक़ के रास्तों पर क़याम किया है जहां तुम एक दूसरे से मिलते थे लेकिन कोई राहनुमा न था और कुँआ खोदते थे लेकिन पानी नसीब न होता था। आज मैं तुम्हारे लिये अपनी इस ज़बाने ख़ामोष को गोया बना रहा हूँ जिसमें बड़ी क़ूवते बयान है। याद रखो के उस शख़्स की राय गुम हो गयी है जिसने मुझ से रू गरदानी की है। मैंने रोज़े अव्वल से आज तक हक़ के बारे में कभी शक नहीं किया है। (मेरा सकूत मिस्ले मूसा (अ) है) मूसा को अपने नफ़्स के बारे में ख़ौफ़ नहीं था, उन्हें दरबारे फ़िरऔन में सिर्फ़ यह ख़ौफ़ था के कहीं जाहिल जादूगर और गुमराह हुक्काम अवाम की अक़्लों पर ग़ालिब न आ जाएं। आज हम सब हक़ व बातिल के रास्ते पर आमने-सामने हैं और याद रखो जिसे पानी पर ऐतमाद होता है वह प्यासा नहीं रहता है।